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'पाबंदियाँ'
बालकृष्ण मिश्रा


होंठ पर पाबन्दियाँ हैं
गुनगुनाने की।

निर्जनों में जब पपीहा
पी बुलाता है।
तब तुम्हारा स्वर अचानक
उभर आता है।

अधर पर पाबन्दियाँ हैं
गीत गाने की। ...
पूरी रचना यहाँ पढें...
'थकी दुपहरी में पीपल पर'
गिरिजाकुमार माथुर


थकी दुपहरी में पीपल पर,
काग बोलता शून्य स्वरों में,
फूल आख़िरी ये बसन्त के
गिरे ग्रीष्म के ऊष्म करों में

धीवर का सूना स्वर उठता
तपी रेत के दूर तटों पर ...
पूरी रचना यहाँ पढें...
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Friday 8th June

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