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रवीन्द्रसंगीत का हिन्दी गीतान्तर, दाउलाल कोठारी द्वारा
'क्यूँ भिजोये ना'
रवीन्द्रनाथ ठाकुर


क्यूँ भिजोये ना नयनों के नीर से, सूखे धूलि कण तेरे।
कौन जाने आओगे तुम्हीं, अनाहूत मेरे॥

पार हो आये हो मरु,
नहीं वहाँ पर छाया तरु,
पथ के दुःख दिये हैं तुम्हें, मन्द भाग्य मेरे॥
...
पूरी रचना यहाँ पढें और सुनें...
गुजराती कविता का अनुवाद, मूल सहित
'आना'
नीशू बाल्यान


मैं यहाँ अकेली हो गई...

मैं घड़ी की, घंटे की सुई
और तू सैकण्ड की सुई
समान... रुकता ही नहीं।
...
पूरी रचना यहाँ पढें और सुनें...
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