अप्रतिम कविताएँ

ये गजरे तारों वाले
इस सोते संसार बीच,
         जग कर सज कर रजनी बाले!
कहाँ बेचने ले जाती हो,
         ये गजरे तारों वाले?
मोल करेगा कौन,
         सो रही हैं उत्सुक आँखें सारी।
मत कुम्हलाने दो,
         सूनेपन में अपनी निधियाँ न्यारी॥
निर्झर के निर्मल जल में,
         ये गजरे हिला हिला धोना।
लहर हहर कर यदि चूमे तो,
         किंचित् विचलित मत होना॥
होने दो प्रतिबिम्ब विचुम्बित,
         लहरों ही में लहराना।
'लो मेरे तारों के गजरे'
         निर्झर-स्वर में यह गाना॥
यदि प्रभात तक कोई आकर,
         तुम से हाय! न मोल करे।
तो फूलों पर ओस-रूप में
         बिखरा देना सब गजरे॥
- रामकुमार वर्मा
काव्यपाठ: वाणी मुरारका
विषय:
रात (5)

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 आत्म-समर्पण
 ये गजरे तारों वाले
इस महीने :
'आठ वर्ष'
जया प्रसाद


रिमझिम सावन बरसा जब
अंक तुम्हें भर लायी थी
कुछ खोयी-सी, कुछ अबूझ
कुछ खुश, कुछ घबराई थी

गोल-मटोल, चार पैर पर
घर-आँगन सब नाप लिया
नन्हे वामन जैसे तुमने
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
इस महीने :
'यूंँ पति की मांँ बनते जाना'
किरण सिपानी


हर पल वीडियो दिखाकर फुसलाते जाना
और यूंँ कौरों का हलक से उतरते जाना ‌
कभी वायलिन पकड़ना, कभी झटक के रख देना
रूठना- मचलना- न नहाने की ज़िद करते रहना
कातर नजरों से मेरे हुक्म को सिर्फ तकते रहना
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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