ये गजरे तारों वाले
इस सोते संसार बीच,
         जग कर सज कर रजनी बाले!
कहाँ बेचने ले जाती हो,
         ये गजरे तारों वाले?
मोल करेगा कौन,
         सो रही हैं उत्सुक आँखें सारी।
मत कुम्हलाने दो,
         सूनेपन में अपनी निधियाँ न्यारी॥
निर्झर के निर्मल जल में,
         ये गजरे हिला हिला धोना।
लहर हहर कर यदि चूमे तो,
         किंचित् विचलित मत होना॥
होने दो प्रतिबिम्ब विचुम्बित,
         लहरों ही में लहराना।
'लो मेरे तारों के गजरे'
         निर्झर-स्वर में यह गाना॥
यदि प्रभात तक कोई आकर,
         तुम से हाय! न मोल करे।
तो फूलों पर ओस-रूप में
         बिखरा देना सब गजरे॥
- रामकुमार वर्मा
काव्यपाठ: वाणी मुरारका

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रामकुमार वर्मा
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 आत्म-समर्पण
 ये गजरे तारों वाले
इस महीने :
'पुनः'
राज हंस गुप्ता


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पुनः झरता एकदा आलोक-पावस।

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झाड़ियाँ हैं ठूंठ हैं या अस्थि-पंजर।
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इस महीने :
'इतिहास खुद को दोहराएगा'
बबीता माँधणा


इक दिन मेरी दादी बोली,
तुम सब मिल मुझे चिढ़ाते हो
'दाढ़ी की अम्मा' कहते हो।
हम कहते 'डैडी की अम्मा'
वे सुनती 'दाढ़ी की अम्मा'।
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इस महीने :

'धीरे-धीरे रस लेकर: "समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न" पर प्रतिक्रिया'
अनिता निहलानी


"कविता को रस लेकर धीरे-धीरे ही पढ़ना चाहिए," अनिता निहलानी। वह स्वयं कवयित्री, लेखिका, योग शिक्षिका हैं। उन्होंने विनोद तिवारी का काव्य संकलन "समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न" का रसास्वादन किया।

एक दिन में बस एक ही कविता पढ़ीं। जैसे जैसे पढ़ती गईं, पुस्तक के प्रथम भाग "एक एहसास है उम्र भर के लिए" की हर एक कविता पर अपनी प्रतिक्रिया भेजती गईं। उनके साथ हमने भी एक प्यारा सफर तय किया। ..

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'समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न'
विनोद तिवारी


विनोद तिवारी की कविताओं का संकलन
काव्यालय का पुस्तक प्रकाशन
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