अप्रतिम कविताएँ पाने
वह चिढ़ाता कोना
चेहरे पर फैल आए बालों को,
अपनी अलसाई उंगलियो से हटाया था,
कुछ समय खुद मे ही खोने के बाद
जब तुम्हारी तरफ़ देखा तो,
तुम अभी भी सो रहे थे,
तुम्हे छुने की कोशिश मे,
मैने हाथ भी बढ़ाया था,
पर तुम तब भी सो रहे थे,
कुछ खाली सा लगा मुझे मुझमें
टटोलने का मन भी हुआ
शायद कोई कोना कहीं बंद पड़ा हो
और मेरे ढूँढने पर मिल जाए वो
पर कहीं कुछ अभी भी सूना था
एक झुंझलाहट सी हुई खुद पर
वेहम है शायद मेरा
कह कर खुद को झिड़क दिया मैने
मगर वह खाली कोना अभी भी चिढ़ा रहा था
हिम्मत बटोर कर मैं उस कोने से ही पूछा,
क्या चाहिए तुझे?
अब और क्या बाकी है?
उसने तनिक दबी हँसी से कहा,
ये मूरख किसे बनाती हो?
जिसे छुकर उसके होने का यकीन खुद को दिलाती हो,
क्या सच मे उसे ही पाना चाहती हो?
लगा की चोरी पकड़ ली गयी हो मेरी,
हर स्पर्श में मैंने जो महसूस किया
क्या सिर्फ़ तुम्हारी आकुलता नही थी?
एक ज़रूरत,
उसके आगे सब शून्य था
और यही शून्य अब उस कोने मे जा बैठा था
- जागृति जायसवाल
Jagriti Jaiswal
Email : [email protected]
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इस महीने :
'ओस जितनी नमी '
जया प्रसाद


एक नाप जितनी ख़लिश
ख़लती नहीं
चलती है

जैसे ओस की बूंद जितना
सीलापन
जैसे नींद के बाद वाली
हलकी सी थकन --
..

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अक्षर नगरी

एक थी अक्षर नगरी सुन्दर
उसमें रहते सारे अक्षर।
एक था छोटा बच्चा अ,
उसका भाई बड़क्का आ।
अ की सखी थी छोटी इ।
उसकी बड़ी बहन थी ई।
चारों बच्चे बहुत दोस्त थे;
साथ खेलते और पढ़ते थे।

एक बार वे चारों बच्चे
एक पार्क में खेल रहे थे।
उस दिन उनके उसी पार्क
में चार नए बच्चे आये थे।

... पूरी रचना यहाँ पढ़ें

इस महीने :
'इस नश्वर संसार में'
कुंदन सिद्धार्थ


सिर्फ़ दुख नहीं जाता
सुख भी चला जाता है
यहाँ रहने कौन आया है

सिर्फ़ घृणा नहीं हारती
प्रेम भी हार जाता है

संसार में सबसे दुखभरी होती है प्रेम की हार
तब प्रेम सिर्फ़ कविताओं और कहानियों में
बचा रह जाता है

यही बचा हुआ प्रेम
हमारी आँखों में ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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