अप्रतिम कविताएँ
तुम नहीं हो?
है धुंधलका
हल्का हल्का
ठहरा ठहरा
पाँव पल का
मन हिंडोला डोलता है
मूक अश्रु पूछता है
तुम नहीं हो?

चासनी से
छन रहे हो
चाँदनी से
झर रहे हो
छुप रहे हो
छल रहे हो
बस तुम्ही-तुम
हर कहीं हो
तुम नहीं हो?

हो जो भीतर
क्यूँ न बाहर
बीच क्यूँ है
काली चादर
आस बे-पर
साँस बे-घर
शेष फिर भी
ढाई आखर
सब ग़लत बस
तुम सही हो
तुम नहीं हो?

जानते हो
जान-से हो
क्यूँ बने
अनजान से हो
दूरियों में
जल रहे हो
मुझमें पल-पल
ढल रहे हो
सोचते हो
के नहीं हो
पर यहीं हो

तुम यहीं हो
तुम यहीं हो
तुम यहीं हो!
- अंजु वर्मा
email: [email protected]
विषय:
प्रेम (63)
अध्यात्म दर्शन (38)

काव्यालय को प्राप्त: 7 May 2019. काव्यालय पर प्रकाशित: 6 Sep 2019

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इस महीने :
'आठ वर्ष'
जया प्रसाद


रिमझिम सावन बरसा जब
अंक तुम्हें भर लायी थी
कुछ खोयी-सी, कुछ अबूझ
कुछ खुश, कुछ घबराई थी

गोल-मटोल, चार पैर पर
घर-आँगन सब नाप लिया
नन्हे वामन जैसे तुमने
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
इस महीने :
'यूंँ पति की मांँ बनते जाना'
किरण सिपानी


हर पल वीडियो दिखाकर फुसलाते जाना
और यूंँ कौरों का हलक से उतरते जाना ‌
कभी वायलिन पकड़ना, कभी झटक के रख देना
रूठना- मचलना- न नहाने की ज़िद करते रहना
कातर नजरों से मेरे हुक्म को सिर्फ तकते रहना
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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