स्वप्न के गलियारे में
हैं सत्य ये नयन जब
होगा स्वप्न अस्तित्व भी
स्वप्न के गलियारे में
उन्नत आकाश होता है

ऊसर धरा में अंकुर जैसे
दमक चमक जाते हैं ये
स्वप्न के गलियारे में
कितना उल्लास होता है

अचानक उड़ जाते हैं पखेरू
मेरी सामर्थ्य से कहीं दूर
स्वप्न के गलियारे में
निरर्थक प्रयास होता है

होगे यें भी सत्य ही
तुम्हारे कहे शब्द कदाचित
स्वप्न के गलियारे में
मरीचिका आभास होता है

ना जाने कैसे क्यूँ
ये भूल गया था मैं
स्वप्न के गलियारे में
घोर कुहास होता है

परंतु आज नवस्वप्न लेकर
मैं फिर निकल पड़ा हूँ
स्वप्न के गलियारे में
जहां मंद प्रकाश होता है
- विकास अग्रवाल
Vikas Agarwal
Email: [email protected]
Vikas Agarwal
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इस महीने :
'छिपा लेना'
राम कृष्ण "कौशल"


जब वेग पवन का बढ़ जाए
अंचल में दीप छिपा लेना।

कुछ कहते कहते रुक जाना
कुछ आंखों आंखों कह देना
कुछ सुन लेना चुपके चुपके
कुछ चुपके चुपके सह लेना

रहने देकर मन की मन में
तुम गीत प्रणय के गा लेना
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'सूर्य'
रामधारी सिंह 'दिनकर'


सूर्य, तुम्हें देखते-देखते
मैं वृद्ध हो गया।

लोग कहते हैं,
मैंने तुम्हारी किरणें पी हैं,
तुम्हारी आग को
पास बैठकर तापा है।

और अफ़वाह यह भी है
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :

'काव्यालय के आँकड़े - जुलाई 2020 से मार्च 2021'


जब विश्व भर में मानवजाति एक नए अदृश्य ख़तरे से लड़ रही थी, तब काव्यालय के जीवन में क्या हो रहा था? प्रस्तुत है काव्यालय का चौथा वार्षिक रिपोर्ट -- ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
आज नदी बिल्कुल उदास थी -- केदारनाथ अग्रवाल
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