आज हुआ मन को विश्वास
समय बना है यादों से
यादें बनती भूल भूल कर
तुम क्या इस को स्वीकारोगे?
व्यथित हुआ करता है जब मन
कुंठित होती है जब पीड़ा
तब क्या याद न कुछ आता है?
वह क्षण जो केवल अपना था
आज बन गया जो इतिहास।
आज हुआ मन कोआभास
स्मृति विस्मृति साथ चली हैं
मैं इनके छोटे से कण ले
कभी कहीं गुम हो जाऊंगी
मृदुल मधुर दे करअहसास
निस्पृह सा दे कर अहसास।
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।