समय बना है यादों से
आज हुआ मन को विश्वास
समय बना है यादों से
यादें बनती भूल भूल कर
तुम क्या इस को स्वीकारोगे?
व्यथित हुआ करता है जब मन
कुंठित होती है जब पीड़ा
तब क्या याद न कुछ आता है?
वह क्षण जो केवल अपना था
आज बन गया जो इतिहास।

आज हुआ मन कोआभास
स्मृति विस्मृति साथ चली हैं
मैं इनके छोटे से कण ले
कभी कहीं गुम हो जाऊंगी
मृदुल मधुर दे करअहसास
निस्पृह सा दे कर अहसास।
- सुमन शुक्ला

काव्यालय को प्राप्त: 25 Mar 2020. काव्यालय पर प्रकाशित: 29 May 2020

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इस महीने :
'पुनः'
राज हंस गुप्ता


सोम हो गए स्वप्न जीवन भर अमावस।
पुनः झरता एकदा आलोक-पावस।

जगत सीमातीत मरुस्थल-सा अनुर्वर।
झाड़ियाँ हैं ठूंठ हैं या अस्थि-पंजर।
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इस महीने :
'इतिहास खुद को दोहराएगा'
बबीता माँधणा


इक दिन मेरी दादी बोली,
तुम सब मिल मुझे चिढ़ाते हो
'दाढ़ी की अम्मा' कहते हो।
हम कहते 'डैडी की अम्मा'
वे सुनती 'दाढ़ी की अम्मा'।
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इस महीने :

'धीरे-धीरे रस लेकर: "समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न" पर प्रतिक्रिया'
अनिता निहलानी


"कविता को रस लेकर धीरे-धीरे ही पढ़ना चाहिए," अनिता निहलानी। वह स्वयं कवयित्री, लेखिका, योग शिक्षिका हैं। उन्होंने विनोद तिवारी का काव्य संकलन "समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न" का रसास्वादन किया।

एक दिन में बस एक ही कविता पढ़ीं। जैसे जैसे पढ़ती गईं, पुस्तक के प्रथम भाग "एक एहसास है उम्र भर के लिए" की हर एक कविता पर अपनी प्रतिक्रिया भेजती गईं। उनके साथ हमने भी एक प्यारा सफर तय किया। ..

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इस महीने :

'समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न'
विनोद तिवारी


विनोद तिवारी की कविताओं का संकलन
काव्यालय का पुस्तक प्रकाशन
वाणी मुरारका की चित्रकला के संगे
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