पुनर्मिलन
फिर तुम्हारे अंक में नव प्रीत के दो पल बिता लूँ
इस बहाने दंभ के उस आवरण को भी हटा लूँ

खिल रही है चंद्रिका और रैन नीरव हो रही
बह रहा शीतल पवन अँगड़ाइयाँ तुम ले रही
फिर सघनतम मेह बनकर गेह सारा मैं भिगा लूँ
फिर तुम्हारे अंक में नव प्रीत के दो पल बिता लूँ

सुप्त सी अब हो चुकी हैं स्नेह की वो भावनायें
मिट सकी न हृदय से अतृप्त सी वो कामनायें
तुम सरस श्रृंगार कर लो प्रेमरस फिर से पिला लूँ
फिर तुम्हारे अंक में नव प्रीत के दो पल बिता लूँ

दंश दे जो जिंदगी को वह कहानी हम भुला दें
आपसी मनभेद की अंतर्व्यथा को हम सुला दें
नेह के नवपुष्प का नव अंकुरण फिर से करा लूँ
फिर तुम्हारे अंक में नव प्रीत के दो पल बिता लूँ

अब कहीं अपवंचनायें वर्जनायें ना रहें
नियति से अभिशप्त होती वासनायें ना रहें
मधुभरे आलंब से मधुपान मैं तुमको करा लूँ
फिर तुम्हारे अंक में नव प्रीत के दो पल बिता लूँ

क्रोध को निस्तेज कर उसका शमन अब हम करें
इस तरह निज धैर्य की सीमा में अभिवर्धन करें
प्रीत के संबंध का अनुबंध तुमसे मैं करा लूँ
फिर तुम्हारे अंक में नव प्रीत के दो पल बिता लूँ

ज्योति के नवपुंज से अंतस प्रकाशित हम करें
जिंदगी के पुष्प को आओ सुवासित हम करें
फिर तुम्हारे मृदुल स्वर को गीत मैं अपना बना लूँ
फिर तुम्हारे अंक में नव प्रीत के दो पल बिता लूँ

कांत कुंजित किंशुकी की कांतिमय कमनीयता
फिर सुशोभित हो गई सौंदर्य की रमणीयता
विजन वन की वल्लरी को गुलमोहर फिर से बना लूँ
फिर तुम्हारे अंक में नव प्रीत के दो पल बिता लूँ

तुम नवल रससिक्त अंबुज हो सरस मधुयामिनी
छलकता है गेह से रसधार ओ उद्दामिनी
फिर तुम्हारे अधर का लालित्य आओ मैं बढ़ा लूँ
फिर तुम्हारे अंक में नव प्रीत के दो पल बिता लूँ

तुम मधुरतम कल्पना हो अल्पना हो कांति की
दिव्यतम अभिव्यंजना परिकल्पना मधुमास की
अर्चना के पुष्प से वेणी तुम्हारी मैं सजा लूँ
फिर तुम्हारे अंक में नव प्रीत के दो पल बिता लूँ
- राजेश कुमार दूबे

काव्यालय को प्राप्त: 19 Sep 2016. काव्यालय पर प्रकाशित: 3 Mar 2017

***
इस महीने : समर्पण गीत
'आत्म-समर्पण'
रामकुमार वर्मा


सजल जीवन की सिहरती धार पर,
लहर बनकर यदि बहो, तो ले चलूँ।

यह न मुझसे पूछना, मैं किस दिशा से आ रहा हूँ,
है कहाँ वह चरणरेखा, जो कि धोने जा रहा हूँ,
पत्थरों की चोट जब उर पर लगे,
एक ही "कलकल" कहो, तो ले चलूँ।

सजल जीवन की सिहरती धार पर,
लहर बनकर यदि बहो, तो ले चलूँ।

मार्ग में तुमको मिलेंगे वात के प्रतिकूल झोंके,
दृढ़ शिला के खण्ड होंगे दानवों से राह रोके,
यदि प्रपातों के भयानक तुमुल में,
भूल कर भी भय न हो, तो ले चलूँ।

सजल जीवन की सिहरती धार पर,
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
अगली प्रस्तुति
शुक्रवार 3 अप्रैल को

सूचना पाने के लिए
ईमेल दर्ज़ करें
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
आपकी कविता | सम्पर्क करें | हमारा परिचय

a  MANASKRITI  website