प्रेम
किसी चट्टान की
खुरदुरी सतह पर उभरी
किसी दरार पर
हौले से अपना हाथ यूँ रखो
मानो पूछ रहे हो
उससे उसकी खैरियत।
तुम देखना
कुछ समय बाद
वहाँ कोई कोंपल फूट गई होगी
अथवा
उस दरार में
पानी के निशान होंगे।
- सुरेश बरनवाल
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काव्यालय को प्राप्त: 18 Jun 2018. काव्यालय पर प्रकाशित: 26 Jul 2019

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इस महीने :
'अघट घटती जा रही है'
जया प्रसाद


ये ज़िन्दगी बेचैन कुछ लम्हों में कटती जा रही है
निरंतर अस्थिर अनिश्चित अघट घटती जा रही है।

किसी रोज़ उड़ चली, बदरंग मौसम में कभी
किसी रोज़ बह चली, पानी के कलकल में कभी
जैसे जैसे बिखरती वैसे सिमटती जा रही है
निरंतर अस्थिर अनिश्चित अघट घटती जा रही है।
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'तस्वीर की लडकी बोलती है'
प्रत्यक्षा


जिस रात
अँधेरा गहराता है
चाँदनी पिघलती है
मैं हौले कदमों से
कैनवस की कैद से
बाहर निकलती हूँ

बालों को झटक कर खोलती हूँ
और उन घनेरी ज़ुल्फों में
टाँकती हूँ जगमगाते सितारे
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
युगों युगों से भटक रहा है
मेरा शाश्वत एकाकीपन।
धीरे धीरे उठा रहा हूँ
अपनी पीड़ा का अवगुंठन।

~ विनोद तिवारी


संकलन "समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न" से

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