हर पल वीडियो दिखाकर फुसलाते जाना
और यूंँ कौरों का हलक से उतरते जाना
कभी वायलिन पकड़ना, कभी झटक के रख देना
रूठना- मचलना- न नहाने की ज़िद करते रहना
कातर नजरों से मेरे हुक्म को सिर्फ तकते रहना
पुराने घर को तरसना, यूंँ खोजते-भटकते रहना
मजबूत हाथों का मेरी मुट्ठी में फिसलते जाना
बच्चे सी निश्छलता का आंँखों में उतरते जाना
गिले-शिकवों का ममता में यूंँ पिघलते जाना
हर पल मेरा शिशु-पति की मांँ बनते जाना
खिलाना-पिलाना-थपकाना-सहलाते जाना
बूढ़ी उम्र में नयी मांँ का यूंँ जंँवा होते जाना।
काव्यालय को प्राप्त: 17 May 2026.
काव्यालय पर प्रकाशित: 9 Oct 2026