अप्रतिम कविताएँ
खिलौना
बीच बाज़ार
खिलौने वाले
के खिलौने
की आवाज़ से
आकर्षित हो
कदम उसकी
तरफ बढ़े,
मैंने छुआ,
सहलाया उन्हें
व एक खिलौने
को अंक में भरा
कि पीछे से कर्कष
आवाज़ ने मुझे
झंझोड़ा
‘‘तुम्हारी बच्चों की सी
हरकतें कब खत्म होंगी!’’
सुनकर मेरा नन्हा बच्चा
सहम सा गया
मेरी प्रौढ़ देह के अन्दर।
- शबनम शर्मा
Email: [email protected]
विषय:
स्त्री (19)
समाज (33)

काव्यालय को प्राप्त: 5 Nov 2016. काव्यालय पर प्रकाशित: 20 Jul 2017

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इस महीने :
'यूंँ पति की मांँ बनते जाना'
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हर पल वीडियो दिखाकर फुसलाते जाना
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कभी वायलिन पकड़ना, कभी झटक के रख देना
रूठना- मचलना- न नहाने की ज़िद करते रहना
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..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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नहीं नाचूँगा मैं
तुम्हारे युद्ध के
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तुम्हारे युद्ध के नगाड़ों को। नहीं
नाचूँगा तुम्हारी
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पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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छोटे-छोटे जूते लाइन में रखे थे,
मासूम आँखों में डर चिपका था,
नाम, धर्म, उम्र — सब मिटा दिए गए,
सिर्फ़ एक चिन्ह — स्टार ऑफ़ डेविड बाकी था।

बिना शोर के ट्रेनें चली थीं,
सपनों को डिब्बों में बंद कर,
हर स्टेशन पर कोई माँ रोई थी,
और बच्चों ने

ईंटों की दीवा ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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