खामोशी बोल उठी
खामोशी बहना चाहती थी
मैं नदी बन गई
खामोशी उड़ना चाहती थी
मैं हवा बन गई
खामोशी अब खेलना चाहती है
मैंने उसे शब्द थमा दिए
वह बोलना भी चाहती है
मैंने एक कलम पकड़ा दी
अब वह हंसना और रोना चाहती है
खामोशी कविता में ढल गई।
- पूनम चन्द्रलेखा

काव्यालय को प्राप्त: 29 Sep 2019. काव्यालय पर प्रकाशित: 31 Jan 2020

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आज नदी बिल्कुल उदास थी -- केदारनाथ अग्रवाल
इस महीने :
'धत्'
दिव्या माथुर


सीधा
मेरी आँखों में
बेधड़क घूरती
बिल्ली सा
वह एक
निडर ख़्याल तेरा
टाँगों के बीच
पूँछ दबा
मेरी एक धत् से
भाग लिया।
..

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इस महीने :
'हाइकु'
अनूप भार्गव


मुठ्ठी में कैद
धूप फिसल गयी
लड़की हँसी ..

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इस महीने :
'बूँदें'
कुसुम जैन


बरसती हैं बूँदें
झूमते हैं पत्ते

पत्ता-पत्ता जी रहा है
पल पल को

आने वाले कल से बेख़बर
..

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