'केसव' चौंकति सी चितवै
'केसव' चौंकति सी चितवै, छिति पाँ धरके तरकै तकि छाँहि।
बूझिये और कहै मुख और, सु और की और भई छिन माहिं॥
डीठी लगी किधौं बाई लगी, मन भूलि पर्यो कै कर्यो कछु काहीं।
घूँघट की, घट की, पट की, हरि आजु कछु सुधि राधिकै नाहीं॥
- केशवदास

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केशवदास
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अनहोनी बातों की
आशा में जीना
कितना रोमांचकारी है

मैं उसी की आशा में
जी रहा हूँ
सोच रहा हूँ
हवा की ही नहीं
सूर्य किरनों की गति
मेरी कविता में आएंगी
मेरी वाणी
उन तूफ़ानों को गाएंगी
जो अभी उठे नहीं है
..

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ऊँची उठ रही हैं
इति की यह तटिनी
बाढ़ पर है अब

ढह रही हैं मन से घटनाएँ
छोटी-बडी यादें और चेहरे
..

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शुक्रवार 5 जुलाई को

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