जो तुम तोरौ राम, मैं नहिं तोरौं,
तुम सो तोरि कवन संग जोरौं॥
तीरथ बरत न करौं अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल को भरोसा॥
जहँ जहँ जावों तुम्हरी पूजा, तुम सा देव और नहिं दूजा॥
मैं अपनो मन हरि सों जोर्यो, हरि सो जारि सवन सों तोर्यो॥
सबहीं पहर तुम्हरी आसा, मन क्रम बचन कहै 'रैदासा'॥
भावुकता और पवित्रता
भाव-रस के लिए हमारे हृदय में एक स्वाभाविक लोभ होता है। काव्य और शिल्पकला से, गल्प, गान और अभिनय से,
भाव-रस का उपभोग करने का आयोजन हम करते रहते हैं।
प्राय: उपासना से भी हम भाव-तृप्ति चाहते हैं। कुछ क्षणों के लिए एक विशेष रस का आभोग करके हम यह सोचते
हैं कि हमें कुछ लाभ हुआ। धीरे-धीरे इस भोग की आदत एक नशा...
देखो, तो अब भी कितनी चुस्त-दुरुस्त और पुरअसर है
हमारी सदी की नफ़रत,
किस आसानी से चूर-चूर कर देती है
बड़ी-से-बड़ी रुकावटों को!
किस फुर्ती से झपटकर
हमें दबोच लेती है!
यह दूसरे जज़्बों से कितनी अलग है --
एक साथ ही बूढ़ी भी और जवान भी।
यह खुद
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