अप्रतिम कविताएँ
इतना अकेले?
छूटती हुई सांसे,
बुझते हुए मन,
आज जिन्दगी
एक नए अन्दाज़ में है ।
दूरियां बढ़ाते बढ़ाते,
कुछ लोग बहुत दूर
निकल गए हैं,
लौटना मुश्किल है ।
मोहब्बतें अब बिल्कुल भी,
जिस्मानी नही हैं,
रूहें रूहों से मिलने को
तैयार हैं ।
जंगलों की तरह
फैलती इंसानियत,
अब धीरे धीरे
सिमटने लगी है ।
मालूम तो था कि
अकेले ही जाना है,
पर
इतना अकेले?
- वीरेंद्र जैन 'उन्मुक्त'

काव्यालय को प्राप्त: 4 May 2021. काव्यालय पर प्रकाशित: 21 May 2021

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इन दिनों मैं डूब-उतरा रही हूँ
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चाय पत्ती के सैशे-सा मेरा व्यक्तित्व
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वह तोड़ती पत्थर।

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..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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