इतना अकेले?
छूटती हुई सांसे,
बुझते हुए मन,
आज जिन्दगी
एक नए अन्दाज़ में है ।
दूरियां बढ़ाते बढ़ाते,
कुछ लोग बहुत दूर
निकल गए हैं,
लौटना मुश्किल है ।
मोहब्बतें अब बिल्कुल भी,
जिस्मानी नही हैं,
रूहें रूहों से मिलने को
तैयार हैं ।
जंगलों की तरह
फैलती इंसानियत,
अब धीरे धीरे
सिमटने लगी है ।
मालूम तो था कि
अकेले ही जाना है,
पर
इतना अकेले?
- वीरेंद्र जैन 'उन्मुक्त'

काव्यालय को प्राप्त: 4 May 2021. काव्यालय पर प्रकाशित: 21 May 2021

***
वीरेंद्र जैन 'उन्मुक्त'
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 अनोखा रिश्ता
 इतना अकेले?
इस महीने :
'एक कवि का अंतर्द्वंद्व'
विनय सौरभ


वह बहुत उदास-सी शाम थी
जब मैं उस स्त्री से मिला

मैंने कहा - मैं तुमसे प्रेम करता हूँ
फिर सोचा - यह कहना कितना नाकाफ़ी है
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'वो हवा वहीं ठहरी है'
प्रकाश देवकुलिश


वो हवा वहीं ठहरी है अभी तक
और छूती है रोज
लगभग रोक लेती हुई सी
जब गुजरने लगता हूँ वहाँ से
जहाँ उस दिन गुजरते फोन आ गया था तुम्हारा
और थोड़ी देर के लिए आस पास
चम्पा के फूल खिल आये थे
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'तेरी हँसी कृष्ण विवर सी'
पूनम सिन्हा


छोटी सी दुनिया
कितने सारे लोग
रज तम सत का
विभिन्न संयोग।
सहूलियत के हिसाब से
बाँट लिया,
कितने नामों से
पुकार लिया,
मान्यताओं और परम्पराओं में
जकड़ लिया
... ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
आपकी कविता | सम्पर्क करें | हमारा परिचय

a  MANASKRITI  website