अप्रतिम कविताएँ पाने
इतना अकेले?
छूटती हुई सांसे,
बुझते हुए मन,
आज जिन्दगी
एक नए अन्दाज़ में है ।
दूरियां बढ़ाते बढ़ाते,
कुछ लोग बहुत दूर
निकल गए हैं,
लौटना मुश्किल है ।
मोहब्बतें अब बिल्कुल भी,
जिस्मानी नही हैं,
रूहें रूहों से मिलने को
तैयार हैं ।
जंगलों की तरह
फैलती इंसानियत,
अब धीरे धीरे
सिमटने लगी है ।
मालूम तो था कि
अकेले ही जाना है,
पर
इतना अकेले?
- वीरेंद्र जैन 'उन्मुक्त'

काव्यालय को प्राप्त: 4 May 2021. काव्यालय पर प्रकाशित: 21 May 2021

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एक नाप जितनी ख़लिश
ख़लती नहीं
चलती है

जैसे ओस की बूंद जितना
सीलापन
जैसे नींद के बाद वाली
हलकी सी थकन --
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
अक्षर नगरी

एक थी अक्षर नगरी सुन्दर
उसमें रहते सारे अक्षर।
एक था छोटा बच्चा अ,
उसका भाई बड़क्का आ।
अ की सखी थी छोटी इ।
उसकी बड़ी बहन थी ई।
चारों बच्चे बहुत दोस्त थे;
साथ खेलते और पढ़ते थे।

एक बार वे चारों बच्चे
एक पार्क में खेल रहे थे।
उस दिन उनके उसी पार्क
में चार नए बच्चे आये थे।

... पूरी रचना यहाँ पढ़ें

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कुंदन सिद्धार्थ


सिर्फ़ दुख नहीं जाता
सुख भी चला जाता है
यहाँ रहने कौन आया है

सिर्फ़ घृणा नहीं हारती
प्रेम भी हार जाता है

संसार में सबसे दुखभरी होती है प्रेम की हार
तब प्रेम सिर्फ़ कविताओं और कहानियों में
बचा रह जाता है

यही बचा हुआ प्रेम
हमारी आँखों में ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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