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तुम नहीं हो?
है धुंधलका
हल्का हल्का
ठहरा ठहरा
पाँव पल का
मन हिंडोला डोलता है
मूक अश्रु पूछता है
तुम नहीं हो?
चासनी से
छन रहे हो
चाँदनी से
झर रहे हो
छुप रहे हो
छल रहे हो
बस तुम्ही-तुम
हर कहीं हो
तुम नहीं हो?
हो जो भीतर
क्यूँ न बाहर
बीच क्यूँ है
काली चादर
आस बे-पर
साँस बे-घर
शेष फिर भी
ढाई आखर
सब ग़लत बस
तुम सही हो
तुम नहीं हो?
जानते हो
जान-से हो
क्यूँ बने
अनजान से हो
दूरियों में
जल रहे हो
मुझमें पल-पल
ढल रहे हो
सोचते हो
के नहीं हो
पर यहीं हो
तुम यहीं हो
तुम यहीं हो
तुम यहीं हो!
- अंजु वर्मा
email:
[email protected]
विषय:
प्रेम (63)
अध्यात्म दर्शन (37)
काव्यालय को प्राप्त: 7 May 2019. काव्यालय पर प्रकाशित: 6 Sep 2019
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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर
टीलों पर मन्दिर हों
और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ --
मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो
।
मेरा बदन काट कर नहरें
सभी को पोषण पहुँचाएँ।
देखिए
शिव बहादुर सिंह भदौरिया
की कविता
"नदी का बहना मुझमें हो"
पर
विशेष प्रस्तुति
इस महीने :
'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी
रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार
स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'लेखक'
आशीष क़ुरैशी ‘माहिद’
ख़ाली पन्ना किसी खेत-सा
पड़ा रहता है उजाड़।
क़लम की नोक ही बनती है
कुदाल, हँसिया और हल।
हल, जो यादों को कुरेदते हुए
अतीत को खरोंचते हुए
..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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