अप्रतिम कविताएँ
तस्वीर की लडकी बोलती है
जिस रात
अँधेरा गहराता है
चाँदनी पिघलती है
मैं हौले कदमों से
कैनवस की कैद से
बाहर निकलती हूँ

बालों को झटक कर खोलती हूँ
और उन घनेरी ज़ुल्फों में
टाँकती हूँ जगमगाते सितारे

मेरे बदन से फूटती है खुश्बू
हज़ारों चँपई फूल खिलते हैं
आँखों के कोरों से कोई
सहेजा हुआ सपना
टपक जाता है

मदहोश हवा में
अनजानी धुन पर
अनजानी लय से
पैर थिरक जाते हैं
रात भर मैं झूमती हूँ।

पौ फटते ही
बालों को समेटती हूँ
जूड़े में...
बदन की खुशबू को ढंकती हूँ
चादर से,
पलकों को झपकाती हूँ
और कोई अधूरा सपना
फिर कैद हो जाता है
आँखों में।
एक कदम आगे बढ़ाती हूँ
और कैनवस की तस्वीर वाली
लड़की बन जाती हूँ।

तुम आते हो
तस्वीर के आगे ठिठकते हो
दो पल,
फिर दूसरी तस्वीर की ओर
बढ़ जाते हो...

मेरे होंठ बेबस, कैद हैं
कैनवस में
बोलना चाहती हूँ... पर...

क्या तुम नहीं देख पाते
तस्वीर की लड़की के
होंठों की ज़रा सी टेढ़ी
मुस्कुराहट
और नीचे सफेद फर्श पर
गिरे दो चँपई फूल ?
- प्रत्यक्षा
Pratyaksha
email: [email protected]
विषय:
सृजन (11)
कल्पना (4)

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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