अप्रतिम कविताएँ
स्मृति
उस नैनरस के स्मरण भर से ,
मेरे भाव बादल बन गए,
अश्रु झिलमिला उठे और,
स्वप्न काजल बन गए।
पाथेय पर आशाएं बिखरी,
लगा सूर्य क्षितिज से झाँकने,
देख पथ के जुगनू,नभ के तारे,
कुछ सोचकर, कुछ आंकने।
अपने आलिंगन में कर लिया,
जब वायु ने सुगंध को,
आश्रय मिला तेरे ह्रदय का,
मेरे मन स्वछन्द को।
अब भी है अंकित ,इस दृष्टि में,
वो कोमल छवि,वो नैनरस,
समय के पाथेय से,
चुरा रखा है मैंने हर दिवस...
- चेतना पंत
Chetna Pant
Email: nikcathy<at>gmail.com
Chetna Pant
Email: [email protected]
विषय:
प्रेम (63)
बीता समय (18)

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 अथाह
 स्मृति
इस महीने :
'ठहराव'
राहुल सिंह 'राहु'


आओ हम न सोचें कुछ,
न खोजें कुछ,
बस यूँ ही देखें सब कुछ,
इत्मीनान से...
जियें इस पल के गुमान से,
जो रोक रहा हमें,
कौन सा यह भ्रम है?
..

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इस महीने :
'देश की नागरिक'
वाणी मुरारका


आज जब चुनाव नहीं हैं,
आज फिर से चुनती हूँ --
इस देश को मैं अपने मन में
क्या गढ़ूँगी?
कौन से देश की नागरिक बनूँगी?
सवाल खुद से करती हूँ|
..

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इस महीने :
'तू ज़िंदा है'
शैलेंद्र


तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत पे यक़ीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर।

ये सुबह-ओ-शाम के रँगे हुए गगन को चूमकर
तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूम कर!

तू आ मेरा सिंगार कर तू आ मुझे हसीन कर।
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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