अप्रतिम कविताएँ
सपने
कुछ सपनों को जो पंख दिए,
वो खुले आसमान में उड़ने लगे,
बादलों की छांव मिले,
तो कभी तारों की महफिल सजी।
नरम-नरम हवा के पालनों में पलने लगे,
कोरे-कोरे ये सपने रंगों से खेलने लगे,
सुनहरी धूप की धागों से एक नया जहाँ बुनते हुए,
बिखरे-बिखरे यह सपने अपने-आप में ही सिमटने लगे।
लम्बी-लम्बी राहों पर नन्हें-नन्हें कुछ कदम,
मासूम यह सपने मंज़िल की तलाश में चल पड़े.
दीपक की लौ में सूरज की रोशनी नहीं मिली,
तो थककर यह सपने उसी लौ में जलने लगे।
वक्त आगे निकल गया, सपने पीछे छूट गए,
कुछ ठहर गए, कुछ टूट गए, कुछ खुद पर ही हंसने लगे,
ज़िन्दगी के दांव में, खुद ज़िन्दगी को हार के,
अब इन अधूरे सपनो के सौदे होने लगे।
चलते-चलते खो गये, अपनी ही धड़कन से दूर हो गए,
पीछे मुड़े तो दिखा कहानी बनके बिकता अपना ही चहरा,
फिर भी रुका नहीं सांसों और धड़कनों का यह सुस्त कारवां
क्यूंकि टिमटिमा रहा था अभी भी एक सपना सितारा बन के।
- अपर्णा भट्ट
Aparna Bhatt
Email: [email protected]
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विषय:
जीवन (37)

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