तर्जनी
एक अहंकारी उँगली
जब उठती है
तो लगाती है लांछन
या फैलाती है दहशत
पर जब झुक कर
हो जाती है समर्पित
अँगूठे पर
तो बन जाती है मूरत
ज्ञान की, सम्मान की।
मध्यमा
एक सांसारिक उँगली
जब उठती है
तो उड़ाती है उपहास या
दर्शाती है परिहास
पर जब झुक कर
हो जाती है समर्पित
अँगूठे पर
तो बन जाती है मूरत
ध्यान की, वरदान की।
अनामिका
एक अनुरागी उँगली
जब उठती है तो
झुकती हैं पलकें प्रेयसी की
और बनती सेतु दो सत्वो का
पर जब झुक कर होती है
समर्पित अँगूठे पर
तो बन जाती है मूरत
उत्थान की, निर्वाण की।
कनिष्ठा
एक छोटी सी उँगली
जिसके उठने से या
न उठने से
नहीं फ़र्क़ पड़ता
हवन में या अनुष्ठान में
पर जब झुक कर होती है
समर्पित अँगूठे पर
तो बन जाती है मूरत
संज्ञान लिए विद्वान की।
आदमी
मुकुट धारी या भिखारी
भयभीत या दमनकारी
जब भी झुक कर
होता है समर्पित
प्रभु के चरणों में
तो बन जाता है मूरत
इंसान की या भगवान की।
नहीं नाचूँगा मैं
तुम्हारे युद्ध के
नगाड़ों पर। न ही दूँगा
अपनी आत्मा, न ही अपनी अस्थियाँ
तुम्हारे युद्ध के नगाड़ों को। नहीं
नाचूँगा तुम्हारी
ताल पर। मैं जानता हूँ उस ताल को।
जान नहीं है उसमें। जिस चमड़े को
..
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।