अप्रतिम कविताएँ
प्रतिदान में प्रेम
सहेज कर रखना
सुख के उस परम अनुभूति के क्षण को
दो और दो चार हथेलियों के बीच
ज्यों स्वाति नक्षत्र के बूंदों को
जतन से रखता है सीप

पतझड़ के मौसम में
जब यादों की नदी
रेत बन जाएगी
तब स्वाति नक्षत्र की मोती की आभा ही
नर्म हथेलियों की उष्णता को बरकरार रखेगी

एक दिन लौटेगा पथिक
जोगी के वेश में
मांगेगा प्रेम का प्रतिदान भिक्षा में
हो सके तो अंकपाश में जकड़ लेना
पतझड़ में वसंत को कोई
यूँ ही जाने भी देता है क्या?



- राज्यवर्द्धन
चित्रकार: नूपुर अशोक
विषय:
जीवन (37)
प्रेम (63)

काव्यालय को प्राप्त: 31 Jan 2022. काव्यालय पर प्रकाशित: 4 Feb 2022

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इस महीने :
'बन्धन दूँ क्यों'
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चिर मुक्ति न दे पायी जिसको, उसको फिर बन्धन दूँ तो क्यों?

मधुमय प्रभात की बेला में,
रवि ने संध्या का किया मोल;
तब कमल दलों ने भंवरों को,
निज बन्दीगृह से दिया खोल;

तो भी मेरे भोले बन्दी!
तुम भी निज को आजाद करो;
फिर साहस लेकर एक बार,
सूनी कुटिया आबाद करो!

मैं आत्म-समर्पण कर न सकी, झूठा अभिनन्दन दूँ तो क्यों?
..

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भावुकता और पवित्रता

भाव-रस के लिए हमारे हृदय में एक स्वाभाविक लोभ होता है। काव्य और शिल्पकला से, गल्प, गान और अभिनय से, भाव-रस का उपभोग करने का आयोजन हम करते रहते हैं।

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इसका पेट भरती है।
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