अप्रतिम कविताएँ
पायो जी म्हें तो राम रतन धन पायो
पायो जी म्हें तो राम रतन धन पायो।
वस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरू, किरपा कर अपनायो॥
जनम-जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो।
खरच न खूटै चोर न लूटै, दिन-दिन बढ़त सवायो॥
सत की नाँव खेवटिया सतगुरू, भवसागर तर आयो।
'मीरा' के प्रभु गिरिधर नागर, हरख-हरख जस पायो॥
- मीराबाई
विषय:
भक्ति और प्रार्थना (31)

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 पायो जी म्हें तो राम रतन धन पायो
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'आठ वर्ष'
जया प्रसाद


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कुछ खुश, कुछ घबराई थी

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..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
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किरण सिपानी


हर पल वीडियो दिखाकर फुसलाते जाना
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..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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