अप्रतिम कविताएँ
मौन होने दो
शब्द के संसार को अब मौन होने दो॥

दीप जीवन का सजा है चाँदनी बन
ताप के अहसास को कुछ सघन होने दो।
शब्द के संसार को अब मौन होने दो॥

अधर की मुस्कान आँखों की चमक को
सपन सा सुकुमार कोई बीज बोने दो।
शब्द के संसार को अब मौन होने दो॥

प्रभाती आनन्द, मोती हास, नूपुर,
ज़िन्दगी के हार में जम के पिरोने दो।
शब्द के संसार को अब मौन होने दो॥

कड़कती बिजली, बरसती बादरी को,
शौर्य के संगान से अवसाद खोने दो।
शब्द के संसार को अब मौन होने दो॥
- समणी सत्यप्रज्ञा
Samani Satyapragya
Email : [email protected]
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विषय:
चुप्पी (7)

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इस महीने :
'तू ज़िंदा है'
शैलेंद्र


तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत पे यक़ीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर।

ये सुबह-ओ-शाम के रँगे हुए गगन को चूमकर
तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूम कर!

तू आ मेरा सिंगार कर तू आ मुझे हसीन कर।
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
इस महीने :
'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी


रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार

स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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