अप्रतिम कविताएँ
खिलौना
बीच बाज़ार
खिलौने वाले
के खिलौने
की आवाज़ से
आकर्षित हो
कदम उसकी
तरफ बढ़े,
मैंने छुआ,
सहलाया उन्हें
व एक खिलौने
को अंक में भरा
कि पीछे से कर्कष
आवाज़ ने मुझे
झंझोड़ा
‘‘तुम्हारी बच्चों की सी
हरकतें कब खत्म होंगी!’’
सुनकर मेरा नन्हा बच्चा
सहम सा गया
मेरी प्रौढ़ देह के अन्दर।
- शबनम शर्मा
Email: [email protected]
विषय:
स्त्री (18)
समाज (32)

काव्यालय को प्राप्त: 5 Nov 2016. काव्यालय पर प्रकाशित: 20 Jul 2017

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इस महीने :
'रंग'
गीता दूबे


तुम्हारे पास बहुत से रंग हैं
दोस्ती, प्यार, इकरार,
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निश्छल मुस्कान का ... ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
इस महीने :
'गले मिलते रंग'
विनोद दास


आह्लाद में डूबे रंग खिलखिला रहे हैं

इतने रंग हैं
कि फूल भी चुरा रहे हैं रंग
आज तितलियों के लिए

गले मिल रहे हैं रंग

जब मिलता है गले एक रंग
दूसरे रंग से
बदल जाता है ...
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
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