जब तंत्रियों पर फिसलती छुअन
नाभि पर नाचती मिज़राब से
अभिमंत्रित कर देती सितार को
भीतर का समूचा रीतापन
भर उठता है।
रेगिस्तानी साँपों की सरसराहटों
जंगली बाँसों की सीटियों
बिजली की चीत्कारों
सियारों की हुआ हुआ
तने रगड़ते हाथियों के गरजने
भैंसों के सींग भिड़ने से
फूट पड़ता है सुरों का जंगली झरना
झरने का वेग
चेहरे पर सहेजते
बांध लेते हैं तबले
समूचे जंगल को
अपनी बाँहों में
सुर पार करने लगती हैं पगडंडियां
विलम्बित पर चलती
द्रुत पर दौड़ती
तोड़े की टापों टटकारती
झाले में झनकने लगतीं हैं
हवा कुछ नीचे आ ठहर जाती है
आकाश भी झाँकने लगता है
किसे नहीं चाहिए खुशी
अनख रीतेपन के भराव के लिये।
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रति सक्सेना
काव्यालय को प्राप्त: 1 Jan 1997.
काव्यालय पर प्रकाशित: 1 Jan 1997