अप्रतिम कविताएँ
बिखरे पत्ते
इस बसंत में सखी सुना है तुमने
नीम कोंपलें फूटी थी

बढ़ते बचपन के पंखों पर
कड़वे सच की छाँव तले
खुद में पराया दर्द सा पाले
कुछ जागी कुछ सोई थी

इस बसंत में सखी सुना है तुमने
नीम कोंपलें फूटी थी

कोंपल छोटी बिटिया जैसी
चूनर में यौवन दबाए
झुकी झुकी आंखों से अपने
सपने बनाती मिटाती थी

इस बसंत में सखी सुना है तुमने
नीम कोंपलें फूटी थी

पत्ती ने फिर ओंस जनी
हीरे मोती सी सहेजे उसको
बिटिया झुलसती जेठ धूप में
दर दर पानी भटकती रही

इस बसंत में सखी सुना है तुमने
नीम कोंपलें फूटी थी

उभरे कंगूरों से सजकर
दवा हवा में घुलती रही
नीम नहीं बिटिया भी मेरी
हर दिन पतझड़ सहती रही

इस बसंत में सखी सुना है तुमने
नीम कोंपलें फूटी थी
- अन्तरा करवड़े
Antara Karvade
Email : [email protected]
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विषय:
स्त्री (18)

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इस महीने :
'कुछ प्रेम कविताएँ'
प्रदीप शुक्ला


1.
प्रेम कविता, कहानियाँ और फ़िल्में
जहाँ तक ले जा सकती हैं
मैं गया हूँ उसके पार
कई बार।
इक अजीब-सी बेचैनी होती है वहाँ
जी करता है थाम लूँ कोई चीज
कोई हाथ, कोई सहारा।
मैं टिक नहीं पाता वहाँ देर तक।।

सुनो,
अबसे
..

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इस महीने :
'स्वतंत्रता का दीपक'
गोपालसिंह नेपाली


घोर अंधकार हो, चल रही बयार हो,
आज द्वार द्वार पर यह दिया बुझे नहीं।
यह निशीथ का दिया ला रहा विहान है।

शक्ति का दिया हुआ, शक्ति को दिया हुआ,
भक्ति से दिया हुआ, यह स्वतंत्रता-दिया,
रुक रही न नाव हो, ज़ोर का बहाव हो,
आज गंगधार पर यह दिया बुझे नहीं!
यह स्वदेश का दिया प्राण के समान है!
..

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इस महीने :
'युद्ध की विभीषिका'
गजेन्द्र सिंह


युद्ध अगर अनिवार्य है सोचो समरांगण का क्या होगा?
ऐसे ही चलता रहा समर तो नई फसल का क्या होगा?

हर ओर धुएँ के बादल हैं, हर ओर आग ये फैली है।
बचपन की आँखें भयाक्रान्त, खण्डहर घर, धरती मैली है।
छाया नभ में काला पतझड़, खो गया कहाँ नीला मंजर?
झरनों का गाना था कल तक, पर आज मौत की रैली है।

किलकारी भरते ..

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