आवाज़ें
एक पुरानी किताब के पन्नों पे आज उंगली चलाई
जाने कहाँ से कुछ धीमी आवाज़ें आई

आवाज़ एक जानी पहचानी सी
आवाज़ें कुछ बरसों पुरानी सी

एक हँसी थी दूर से आती हुई
गूंजती थी दिल को भरमाती हुई

कितनी ही बातें थी उस आवाज़ में
जाने क्या कह गई अपने ही अंदाज़ में

एक संगीत खामोशी की नींद तोड़ता हुआ
पुरानी ग़ज़लों का दुशाला ओढ़ता हुआ

कुछ सवाल उठे उचक कर ऐसे
नींद से कोई बच्चा जागता हो जैसे

बूढ़ी पंखुड़ियों से बुझी राख टटोल रहा था
उस किताब में दबा एक गुलाब बोल रहा था

मेरा हाथ पकड़ कर वो मुस्कुराने लगा
किन्ही बिछ्ड़े रास्तों पर ले जाने लगा

कुछ सोच कर मैंने उसका हाथ झटक दिया
किताब बंद कर उसका मुंह भी बंद कर दिया
- विकास कुमार 'सपन'
Vikas Kumar 'Sapan'
Email: hi_vikasagrawalyahoo.co.in
Vikas Kumar 'Sapan'
Email: hi_vikasagrawalyahoo.co.in

***
आज नदी बिल्कुल उदास थी -- केदारनाथ अग्रवाल
इस महीने :
'धत्'
दिव्या माथुर


सीधा
मेरी आँखों में
बेधड़क घूरती
बिल्ली सा
वह एक
निडर ख़्याल तेरा
टाँगों के बीच
पूँछ दबा
मेरी एक धत् से
भाग लिया।
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'हाइकु'
अनूप भार्गव


मुठ्ठी में कैद
धूप फिसल गयी
लड़की हँसी ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'बूँदें'
कुसुम जैन


बरसती हैं बूँदें
झूमते हैं पत्ते

पत्ता-पत्ता जी रहा है
पल पल को

आने वाले कल से बेख़बर
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
आपकी कविता | सम्पर्क करें | हमारा परिचय

a  MANASKRITI  website