अप्रतिम कविताएँ
आज बरसों बाद
आज बरसों बाद
जैसे अपने शहर में लौटा हूँ,
गली के सूखे पेड़ पर नई कोंपल को फूटे देखा,
सन्ध्या के हाथों को फिर से रवि को छूते देखा,
धड कन में तेजी पाता हूँ जैसे,
आज बरसों बाद ।
आज बरसों बाद
जैसे पत्तों की रूकी हुई साँस,
सर्र र से उच्छवास बन कर निकल रही है,
जल तल पर फिर से चाँदनी फिसल रही है,
नयनों में जल पाता हूँ जैसे,
आज बरसों बाद ।
आज बरसों बाद,
जैसे चाँद की धुदंली आँख को
बरखा ने अपनी फुहारों से धो डाला है,
मेरी खिड की से फिर झाँक रहा उजाला है,
पवनों में रूनझुन पाता हूँ जैसे,
आज बरसों बाद ।

आज बरसों बाद,
जैसे सैनिक युद्ध से लौटा है,
पीपल तले झूल रही सुहागिन सावन का झूला,
लहराते केशों को देख घन भी बरसना भूला,
दिल में बारूद सा पाता हूँ जैसे,
आज बरसों बाद ।
- राजेश 'पंकज'
Rajesh 'Pankaj'
Email: [email protected]
Rajesh 'Pankaj'
Email: [email protected]
विषय:
बीता समय (18)

काव्यालय पर प्रकाशित: 2 May 2011

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देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
इस महीने :
'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी


रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार

स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'लेखक'
आशीष क़ुरैशी ‘माहिद’


ख़ाली पन्ना किसी खेत-सा
पड़ा रहता है उजाड़।
क़लम की नोक ही बनती है
कुदाल, हँसिया और हल।

हल, जो यादों को कुरेदते हुए
अतीत को खरोंचते हुए

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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