Receive exquisite poems.

Manmeet
jab kaheen
anajaan rajanee ko
Dhulakatee saa(n)jh ne
kaalaa,
sitaaron se damakataa,
shaal pashmeenaa
kabhee oDhaa diyaa --
yaad kitane geet aae.
bichhaDe hue,
kab se n jaane
meet aae.
sach kahoo(n)?
ik pal naa beetaa;
tumhaaree kasam,
tum bahut yaad aae.

jab kaheen,
bahakee havaaon ne
sukomal haath se,
lajatee uShaa ko
baazuon men thaam kar,
ghoonghaT zaraa sarakaa diyaa
tharatharaate onTh par
sparsh tere yaad aae.
gale men do baazuon ke haar kee
us yaad men
zindagee kee har kasakatee haar ko
ham bhool aae.
- Jogendra Singh

काव्यालय को प्राप्त: 15 Aug 2019. काव्यालय पर प्रकाशित: 28 Feb 2020

***
Donate
A peaceful house of the beauty and solace of Hindi poetry, free from the noise of advertisements... to keep Kaavyaalaya like this, please donate.

₹ 500
₹ 250
Another Amount
Jogendra Singh
's other poems on Kaavyaalaya

 Kuhukani
 Manmeet
होलोकॉस्ट में एक कविता
~ प्रियदर्शन

लेकिन इस कंकाल सी लड़की के भीतर एक कविता बची हुई थी-- मनुष्य के विवेक पर आस्था रखने वाली एक कविता। वह देख रही थी कि अमेरिकी सैनिक वहाँ पहुँच रहे हैं। इनमें सबसे आगे कर्ट क्लाइन था। उसने उससे पूछा कि वह जर्मन या अंग्रेजी कुछ बोल सकती है? गर्डा बताती है कि वह 'ज्यू' है। कर्ट क्लाइन बताता है कि वह भी 'ज्यू' है। लेकिन उसे सबसे ज़्यादा यह बात हैरानी में डालती है कि इसके बाद गर्डा जर्मन कवि गेटे (Goethe) की कविता 'डिवाइन' की एक पंक्ति बोलती है...

पूरा काव्य लेख पढ़ने यहाँ क्लिक करें
राष्ट्र वसन्त
रामदयाल पाण्डेय

पिकी पुकारती रही, पुकारते धरा-गगन;
मगर कहीं रुके नहीं वसन्त के चपल चरण।

असंख्य काँपते नयन लिये विपिन हुआ विकल;
असंख्य बाहु हैं विकल, कि प्राण हैं रहे मचल;
असंख्य कंठ खोलकर 'कुहू कुहू' पुकारती;
वियोगिनी वसन्त की...

पूरी कविता देखने और सुनने इस लिंक पर क्लिक करें
random post | poem sections: shilaadhaar yugavaaNee nav-kusum kaavya-setu | pratidhwani | kaavya-lekh
contact us | about us
Donate

a  MANASKRITI  website