चेहरा
मैने देखा चिंता और प्यार,
झुर्रियों की तह के पीछे,
डबडबाती हुई आँखों में अजीब सी चमक,
और चेहरे पे एक खोखली सी हँसी,

मैले फटे हाथों की लकीरों को देखती हुई आँखें,
जैसे अब भी कुछ होने का इन्तजार है,
फिर देखती हुई पल्लू में पड़ी एक गांठ को,
जैसे जीवन भर की दस्तान उसमें हो,

कुछ यादों की पनाह में,
जैसे एक जिंदगी चल रही है,
वर्तमान के खांचे में,
अतीत की खिड़की खुल रही है,

कुछ सोचते हुए आँखे भर आई उसकी,
जैसे सिलापट पे बिखरी ओस की कुछ बूंदे हो,
डबडबायी आँखों में अब दर्द है,
और चेहरे पे एक जानी पहचानी सी मुस्कान ...
- तरुण पन्त
Tarun Pant
Email : [email protected]
Tarun Pant
Email : [email protected]

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इस महीने
'होली की शाम'
गीता मल्होत्रा


होली की शाम सड़कें वीरान
जैसे गुज़र गया हो कारवाँ
छोड़ गया कुछ अपनी निशानियाँ -- ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने
'मामला संगीन है'
नीशू पूनिया


घाटी है... एक औरत

उसी सदियों पुरानी देग में...
ख़ुद के गोश्त को पकाती

कतरा दर कतरा
ख़ुद को ख़ुदी से... करती हलाल
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने
'श्रीहत फूल पड़े हैं'
वीरेन्द्र शर्मा


अंगारों के घने ढेर पर
यद्यपि सभी खड़े हैं
किन्तु दम्भ भ्रम स्वार्थ द्वेषवश
फिर भी हठी खड़े हैं

क्षेत्र विभाजित हैं प्रभाव के
बंटी धारणा-धारा
वादों के भीषण विवाद में
बंटा विश्व है सारा
शक्ति संतुलन रूप बदलते
घिरता है अंधियारा
किंकर्त्तव्यविमूढ़ देखता
विवश मनुज बेचारा ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
अगली प्रस्तुति
शुक्रवार 29 मार्च को

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