अप्रतिम कविताएँ
चेहरा
मैने देखा चिंता और प्यार,
झुर्रियों की तह के पीछे,
डबडबाती हुई आँखों में अजीब सी चमक,
और चेहरे पे एक खोखली सी हँसी,

मैले फटे हाथों की लकीरों को देखती हुई आँखें,
जैसे अब भी कुछ होने का इन्तजार है,
फिर देखती हुई पल्लू में पड़ी एक गांठ को,
जैसे जीवन भर की दस्तान उसमें हो,

कुछ यादों की पनाह में,
जैसे एक जिंदगी चल रही है,
वर्तमान के खांचे में,
अतीत की खिड़की खुल रही है,

कुछ सोचते हुए आँखे भर आई उसकी,
जैसे सिलापट पे बिखरी ओस की कुछ बूंदे हो,
डबडबायी आँखों में अब दर्द है,
और चेहरे पे एक जानी पहचानी सी मुस्कान ...
- तरुण पन्त
Tarun Pant
Email : [email protected]
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विषय:
बीता समय (18)
समाज (31)
बुढ़ापा बीमारी (9)

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इस महीने :
'नदी के द्वीप'
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'


हम नदी के द्वीप हैं।
हम नहीं कहते कि हमको छोड़कर स्रोतस्विनी बह जाए।
वह हमें आकार देती है।
हमारे कोण, गलियाँ, अंतरीप, उभार, सैकत-कूल
सब गोलाइयाँ उसकी गढ़ी हैं।

माँ है वह! है, इसी से हम बने हैं।
किंतु हम हैं द्वीप। हम धारा नहीं हैं।
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पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
इस महीने :
'कल'
रणजीत मुरारका


कल कहाँ किसने
कहा देखा सुना है
फिर भी मैं कल के लिए
जीता रहा हूँ।

आज को भूले
शंका सोच भय
से काँपता
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
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