अनकही सी बात
बात,
जो तुम कह नहीं पाये,
जो रह गयी थी
दो बातों के दरम्यां
अटक कर
तुम्हारे अधरों पर
जिसे छुपा लिया
तुम्हारी नजरों ने
पलकें झुका कर,
उसे पढ़ लिया था मैंने
और वह शामिल हो गया है
मेरे होने में ।
उसी को मैं लिखता हूँ आजकल,
अपनी कविताओं में।
बूँद बूँद
अपने वजूद में डूबोकर।
तुम्हारे लिए
जो थी
एक ज़रा
अनकही सी बात,
वह एक सिलसिला बन गया है
कभी नहीं खत्म होने वाला।
मेरे मन का आकाश
अभी भी ताकता है राह
और फाहे से बनाता है
तरह तरह की तस्वीरें
और फिर फूंक कर उड़ा देता है
इधर उधर
मुस्कुराते हुए।
कभी कभी बरस भी जाता है
आँखों से,
अगर कभी इधर आना
तो लेकर आना
एक नाव।
नदी जो तुम्हें दिखती है सूखी
है दरअसल लबालब भरी हुई।
जिस किनारे पर कभी तुमने लिखा था
अपना नाम,
उसे मैंने अब भी बचाकर रखा है
नदी की धारा से
अपनी देह की आड़ देकर
और तुम्हारी अँगुलियों की छुअन
महसूस करता हूँ
अपनी हथेली पर।
जब आओ तो अपने पैरों के नीचे
रख लेना
एक फूल।
- नीरज नीर

काव्यालय को प्राप्त: 14 Apr 2018. काव्यालय पर प्रकाशित: 7 Dec 2018

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इस महीने :
'गेंद और सूरज'
नूपुर अशोक


बच्चों की एक दुनिया है,
जिसमें एक गेंद है
और एक सूरज भी है।
सूरज के ढलते ही
रुक जाता है उनका खेल
और तब भी
जब गेंद चली जाती है
अंकल की छत पर।

अंकल की दुनिया में है
टीवी और अखबार
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इस महीने :
'गुल्लू'
प्रदीप शुक्ला


'गुल्लू-मुल्लू', 'पारू बच्चा'
नाम एक से एक है अच्छा
'गौरी', 'गुल्लू', 'छोटा माँऊँ'
गिनते जाओ नाम सुनाऊँ
'गुल्ला रानी' बड़ी सयानी
दादी कहतीं सबकी नानी
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इस महीने :

'कौआ'
जया प्रसाद


घर के बाहर कौआ बैठा काँव-काँव चिल्लाता है।
कौन है आने वाला इसकी खबरें कौआ लाता है।

पापा की मौसी के घर से गुड़ की भेली आनी हो,
उस दिन सुबह सवेरे उठता जैसे बुढ़िया नानी हो,
चीख-चीख कर घर वालों को कौआ राग सुनाता है।
उस दिन सबसे पहले क्यों, मुझको नहीं जगाता है ?

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इस महीने :
'लॉकडाउन और मैं'
टुषी भट्टाचार्य


गज़ब वो दिन थे, मैदानों पर होते थे जब सारे खेल;
अब तो घर में बैठे हैं बस, सर में खूब लगाकर तेल।
पुस्तकें सारी पढ़ डाली हैं, रंग डाले हैं सारे चित्र,
धमाचौकड़ी करें भी कैसे, अब जो घर न आते मित्र।
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