अप्रतिम कविताएँ
अचानक
फिर नदी अचानक सिहर उठी
यह कौन छू गया साझं ढले

           संयम से बहते ही रहना
           जिसके स्वभाव में शामिल था
           दिन-रात कटावों के घर में
           ढहना भी जिसका लाजिम था

वह नदी अचानक लहर उठी
यह कौन छू गया सांझ ढले

           छू लिया किसी सुधि के क्षण ने
           या छंदभरी पुरवाई ने
           या फिर गहराते सावन ने
           या गंधमई अमराई ने

अलसायी धारा सँवर उठीं
यह कौन छू गया साँझ ढले

           कैसा फूटा इसके जल में -
           सरगम, किसने संगीत रचा
           मिलना मुश्किल जिसका जग में
           कैसे इसमें वह गीत बचा

सोते पानी में भँवर उठी
यह कौन छू गया साँझ ढले
- विनोद श्रीवास्तव
Poet's Address: 75-C, Anandnagar Chakeri Road, Kanpur-1
Ref: Naye Purane, April,1998
विषय:
शाम (11)
प्रकृति (41)
नदी (3)

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देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
इस महीने :
'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी


रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार

स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'लेखक'
आशीष क़ुरैशी ‘माहिद’


ख़ाली पन्ना किसी खेत-सा
पड़ा रहता है उजाड़।
क़लम की नोक ही बनती है
कुदाल, हँसिया और हल।

हल, जो यादों को कुरेदते हुए
अतीत को खरोंचते हुए

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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