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शरद सुधाकर
हृदय गगन के शरद-सुधाकर,
बिखरा कर निज पुण्य-प्रकाश,
उर अम्बर को उज्ज्वल कर दो
कृपा-किरण फैला कर आज।
त्रिविध ताप संतप्त प्राण को,
शीतल सुधा पिला दो आज॥

मानस-उर-में खिले कुमुदिनी,
मधुर मालती महक उठे।
मन चकोर तव दर्शन प्यासे,
थकित विलोचन, मृदु चितवन,
निर्निमेष तव रूप निहारे,
रोम-रोम में हो पुलकन॥
- राजकुमारी नंदन
शरद : वर्षा के बाद, ठंड के पहले की ऋतु; सुधाकर : चांद; उर : दिल ; त्रिविध ताप : तीन प्रकार के ताप, अर्थात सभी कष्ट; संतप्त : व्यथित; कुमुदिनी : कमल जैसा कमल से छोटा सफेद फूल; मालती : चाँदनी, एक प्रकार का फूल; विलोचन : नयन; मृदु : कोमल; चितवन : दृष्टि; निर्निमेष : अपलक
कविता साभार: कविता कोश से

काव्यालय को प्राप्त: 1 Jan 1900. काव्यालय पर प्रकाशित: 11 Oct 2019

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इस महीने :
'ओस जितनी नमी '
जया प्रसाद


एक नाप जितनी ख़लिश
ख़लती नहीं
चलती है

जैसे ओस की बूंद जितना
सीलापन
जैसे नींद के बाद वाली
हलकी सी थकन --
..

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अक्षर नगरी

एक थी अक्षर नगरी सुन्दर
उसमें रहते सारे अक्षर।
एक था छोटा बच्चा अ,
उसका भाई बड़क्का आ।
अ की सखी थी छोटी इ।
उसकी बड़ी बहन थी ई।
चारों बच्चे बहुत दोस्त थे;
साथ खेलते और पढ़ते थे।

एक बार वे चारों बच्चे
एक पार्क में खेल रहे थे।
उस दिन उनके उसी पार्क
में चार नए बच्चे आये थे।

... पूरी रचना यहाँ पढ़ें

इस महीने :
'इस नश्वर संसार में'
कुंदन सिद्धार्थ


सिर्फ़ दुख नहीं जाता
सुख भी चला जाता है
यहाँ रहने कौन आया है

सिर्फ़ घृणा नहीं हारती
प्रेम भी हार जाता है

संसार में सबसे दुखभरी होती है प्रेम की हार
तब प्रेम सिर्फ़ कविताओं और कहानियों में
बचा रह जाता है

यही बचा हुआ प्रेम
हमारी आँखों में ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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