शाम: एक दृश्य
गहराती हुई शाम है
और उचटे हुए मन पर अबूझ-सी उदासी।

कच्ची सी एक सड़क है,
धान खेतों से होकर गुजरती हुई
दूर तक चली जाती है —
पैना-सा एक मोड़ है
और भटके हुऐ दो विहग।

गहराती हुई शाम है,
घनी पसरी हुई एक खामोशी,
दूर कहीं बजती हुई बंसी के स्वर में
आहिस्ता-आहिस्ता पलाश के फूल
फूट रहे हैं ...
और असंख्य तारों को कतारबद्ध
गिनते हुए बैठे हैं हम दोनों।
- फाल्गुनी रॉय
Poet's email: [email protected]

काव्यालय को प्राप्त: 13 Apr 2018. काव्यालय पर प्रकाशित: 13 Sep 2018

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इस महीने : पूर्णिमा-अमावस्या
'शरद सुधाकर'
राजकुमारी नंदन


हृदय गगन के शरद-सुधाकर,
बिखरा कर निज पुण्य-प्रकाश,
उर अम्बर को उज्ज्वल कर दो
कृपा-किरण फैला कर आज।
..

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शुक्रवार 25 अक्टूबर को

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