अप्रतिम कविताएँ पाने
पुनः
सोम हो गए स्वप्न, जीवन भर अमावस।
पुनः झरता एकदा आलोक-पावस।

जगत सीमातीत मरुस्थल-सा अनुर्वर।
झाड़ियाँ हैं ठूंठ हैं या अस्थि-पंजर।

स्रोत आशा के पुनः भीतर जगाएं।
फिर अलक्षित क्षितिज से सन्देश आयें।

हम हलाहल पान कर जो जल रहे हैं।
खोज तो पीयूष-मधु की कर रहे हैं।

क्या हुआ हों पथ हमारे व्योम-विस्तृत।
कर लें मन-पंछी बसेरा एक निर्मित।
- राज हंस गुप्ता
आलोक -- रोशनी; पावस -- बरसात; सीमातीत -- सीमा के परे; मरुस्थल-सा -- रेगिस्तान सा; अनुर्वर -- जो उपजाऊ नहीं है; अलक्षित -- अदृश्य; पीयूष -- अमृत; व्योम-विस्तृत -- आकाश में फैला हुआ;

काव्यालय को प्राप्त: 24 May 2018. काव्यालय पर प्रकाशित: 26 Jun 2020

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इस महीने :
'ओस जितनी नमी '
जया प्रसाद


एक नाप जितनी ख़लिश
ख़लती नहीं
चलती है

जैसे ओस की बूंद जितना
सीलापन
जैसे नींद के बाद वाली
हलकी सी थकन --
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
अक्षर नगरी

एक थी अक्षर नगरी सुन्दर
उसमें रहते सारे अक्षर।
एक था छोटा बच्चा अ,
उसका भाई बड़क्का आ।
अ की सखी थी छोटी इ।
उसकी बड़ी बहन थी ई।
चारों बच्चे बहुत दोस्त थे;
साथ खेलते और पढ़ते थे।

एक बार वे चारों बच्चे
एक पार्क में खेल रहे थे।
उस दिन उनके उसी पार्क
में चार नए बच्चे आये थे।

... पूरी रचना यहाँ पढ़ें

इस महीने :
'इस नश्वर संसार में'
कुंदन सिद्धार्थ


सिर्फ़ दुख नहीं जाता
सुख भी चला जाता है
यहाँ रहने कौन आया है

सिर्फ़ घृणा नहीं हारती
प्रेम भी हार जाता है

संसार में सबसे दुखभरी होती है प्रेम की हार
तब प्रेम सिर्फ़ कविताओं और कहानियों में
बचा रह जाता है

यही बचा हुआ प्रेम
हमारी आँखों में ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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