फूल नहीं बदले गुलदस्तों के
टूटे आस्तीन का बटन
या कुर्ते की खुले सिवन
कदम-कदम पर मौके, तुम्हें याद करने के।
        फूल नहीं बदले गुलदस्तों के
        धूल मेजपोश पर जमी हुई।
        जहाँ-तहाँ पड़ी दस किताबों पर
        घनी सौ उदासियाँ थमी हुई।
पोर-पोर टूटता बदन
कुछ कहने-सुनने का मन
कदम-कदम पर मौके, तुम्हें याद करने के।
        अरसे से बदला रूमाल नहीं
        चाभी क्या जाने रख दी कहाँ।
        दर्पण पर सिंदूरी रेख नहीं
        चीज़ नहीं मिलती रख दो जहाँ।
चौक की धुआँती घुटन
सुग्गे की सुमिरिनी रटन
कदम-कदम पर मौके, तुम्हें याद करने के।
        किसे पड़ी, मछली-सी तड़प जाए
        गाल शेव करने में छिल गया।
        तुमने जो कलम एक रोपी थी
        उसमें पहला गुलाब खिल गया।
पत्र की प्रतीक्षा के क्षण
शहद की शराब की चुभन
कदम-कदम पर मौके, तुम्हें याद करने के।
- उमाकान्त मालविय

***
इस महीने
'गीत कोई कसमसाता'
अनीता निहलानी


नील नभ के पार कोई
मंद स्वर में गुनगुनाता,
रूह की गहराइयों में
गीत कोई कसमसाता!

निर्झरों सा कब बहेगा
संग ख़ुशबू के उड़ेगा,
जंगलों का मौन नीरव
बारिशों की धुन भरेगा!

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने
'सुप्रभात'
प्रभाकर शुक्ला


नयन का नयन से, नमन हो रहा है
लो उषा का आगमन हो रहा है
परत पर परत, चांदनी कट रही है
तभी तो निशा का, गमन हो रहा है
क्षितिज पर अभी भी हैं, अलसाये सपने
पलक खोल कर भी, शयन हो रहा है
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
अगली प्रस्तुति
शुक्रवार 26 जुलाई को

सूचना पाने के लिए
ईमेल दर्ज़ करें
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
आपकी कविता | सम्पर्क करें | हमारा परिचय

a  MANASKRITI  website