अप्रतिम कविताएँ
फूल नहीं बदले गुलदस्तों के
टूटे आस्तीन का बटन
या कुर्ते की खुले सिवन
कदम-कदम पर मौके, तुम्हें याद करने के।
        फूल नहीं बदले गुलदस्तों के
        धूल मेजपोश पर जमी हुई।
        जहाँ-तहाँ पड़ी दस किताबों पर
        घनी सौ उदासियाँ थमी हुई।
पोर-पोर टूटता बदन
कुछ कहने-सुनने का मन
कदम-कदम पर मौके, तुम्हें याद करने के।
        अरसे से बदला रूमाल नहीं
        चाभी क्या जाने रख दी कहाँ।
        दर्पण पर सिंदूरी रेख नहीं
        चीज़ नहीं मिलती रख दो जहाँ।
चौक की धुआँती घुटन
सुग्गे की सुमिरिनी रटन
कदम-कदम पर मौके, तुम्हें याद करने के।
        किसे पड़ी, मछली-सी तड़प जाए
        गाल शेव करने में छिल गया।
        तुमने जो कलम एक रोपी थी
        उसमें पहला गुलाब खिल गया।
पत्र की प्रतीक्षा के क्षण
शहद की शराब की चुभन
कदम-कदम पर मौके, तुम्हें याद करने के।
- उमाकान्त मालविय
विषय:
विरह (13)
विवाह (9)

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इस महीने :
'आठ वर्ष'
जया प्रसाद


रिमझिम सावन बरसा जब
अंक तुम्हें भर लायी थी
कुछ खोयी-सी, कुछ अबूझ
कुछ खुश, कुछ घबराई थी

गोल-मटोल, चार पैर पर
घर-आँगन सब नाप लिया
नन्हे वामन जैसे तुमने
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'यूंँ पति की मांँ बनते जाना'
किरण सिपानी


हर पल वीडियो दिखाकर फुसलाते जाना
और यूंँ कौरों का हलक से उतरते जाना ‌
कभी वायलिन पकड़ना, कभी झटक के रख देना
रूठना- मचलना- न नहाने की ज़िद करते रहना
कातर नजरों से मेरे हुक्म को सिर्फ तकते रहना
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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