फागुनी बयार
फागुनी बयार एक दस्तक दे जाती है

भूल चुके किस्सों को ताजा कर जाती है,
रेत और माटी सा गीला था वो बचपन
सेमल के फूल और चिलबिल बन जाती है
फागुनी बयार कुछ याद दिला जाती है।

चूड़ियों के टुकड़े गोल पत्थर के गिट्टे ,
गुड़िया की चूनर में गोट लगा जाती है
फागुनी बयार कुछ याद दिला जाती है।

स्लेट - चाक, तख्ती, मिट्टी का बुदका
सेठा और नरकुल की कलम बन जाती है,
फागुनी बयार कुछ याद दिला जाती है।

गर्माती धूप में, खेल, हँसी, भाग-दौड़
सखियों से मिलने का उत्सव बन जाती है
फागुनी बयार कुछ याद दिला जाती है।

पूजा की थाली में बेलपत्र, बेर और
भोले के भांग की ठंडाई बन जाती है
फागुनी बयार कुछ याद दिला जाती है।

नीम, आम, नींबू के फूलों की खुशबू ले
पेड़ो से टपके, टिकोरे बन जाती है
फागुनी बयार कुछ याद दिला जाती है।

भुने हुए बेसन की सोंधी सी खूशबू है
लड्डू , पुए, बर्फी , गुझिया बन जाती है
फागुनी बयार कुछ याद दिला जाती है।

मंजीरा, झांझ और ढोलक की थाप पर
जोगिरा, कबीर, फाग, बिरहा बन जाती है
फागुनी बयार कुछ याद दिला जाती है।

लाल, बैंजनी, पीले, रंगों को साथ लिए
गाल पर गुलाल, मस्त होली बन जाती है
फागुनी बयार कुछ याद दिला जाती है।

होली की मस्ती में छोटी सी चिंता बन
दसवीं के बोर्ड की परीक्षा बन जाती है
फागुनी बयार कुछ याद दिला जाती है।

चिड़ियों के चहक और कोयल की कूक बन
धूल भरे चैत की, आहट बन जाती है
फागुनी बयार कुछ याद दिला जाती है।
- शैली त्रिपाठी

काव्यालय को प्राप्त: 16 Mar 2019. काव्यालय पर प्रकाशित: 6 Mar 2020

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इस महीने :

'कॉरोना काल का प्रेम गीत'
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यह प्रतीक्षा की घड़ी है,
तुम उधर असहाय, हम भी हैं इधर निरुपाय
उस पर
बीच में दुविधा अड़ी है!
यह प्रतीक्षा की घड़ी है!

यूँ हुए अभिशप्त,
अर्जित पुण्य
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स्वर्ग से लाये धरा पर
सूख सब
परिमल गए हैं,

यह समीक्षा की घड़ी है ..

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काव्यालय का पुस्तक प्रकाशन
वाणी मुरारका की चित्रकला के संगे
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