पानी उछाल के
आओ हम पतवार फेंककर
कुछ दिन हो लें नदी-ताल के।

नाव किनारे के खजूर से
बाँध बटोरं शंख-सीपियाँ
खुली हवा-पानी से सीखें
शर्म-हया की नई रीतियाँ

बाँचें प्रकृति पुरुष की भाषा
साथ-साथ पानी उछाल के।

लिख डालें फिर नये सिरे से
रँगे हुए पन्नों को धोकर
निजी दायरों से बाहर हो
रागहीन रागों में खोकर

आमंत्रण स्वीकारें उठकर
धूप-छाँव सी हरी डाल के।

नमस्कार पक्के घाटों को
नमस्कार तट के वृक्षों को

हो न सकें यदि लगातार
तब जी लें सुख हम अंतराल के।
- नईम
Poet's Address: Radhagunj Colony, Devas (M.P.)
Ref: Naye Purane, 1999

***
इस महीने :
'पेड़'
जोएस किलमर


मैं शायद कभी न देखूँगा,
एक पेड़ सी सुन्दर कविता।

पेड़, जिसके वह भूखे होंठ,
वसुधा स्तन-धारा पे हैं लोट।

पेड़, जिसका रुख ईश्वर ओर,
पल्लवित भुजाएं विनय विभोर।
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'चल पथिक तू हौले से'
प्रिया एन. अइयर


टहल रहा गर भोर से पहले
पग तू रखना धीरे से
जगे हुए हैं जीव-जंतु
मानव तुमसे पहले से

खरगोश, कीट और खग निकले
नीड़, बिल, कुंड से खुल के
चंचल अबोध छौने संग
चली हिरन निर्भयता  से

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
चलो समय के साथ चलेंगे,
परिवर्तन होगा धरती पर।
नया ज़माना पैदा होगा,
बूढ़ी दुनिया की अर्थी पर।

जो कुछ हम पर बीत चुकी है,
उस से मुक्त रहो, ओ नवयुग।
नए नए फूलों से महको,
मेरे मधुवन, जीयो जुग जुग।

~ विनोद तिवारी की कविता "मेरे मधुवन" का अंश संकलन "समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न" से

संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
आपकी कविता | सम्पर्क करें | हमारा परिचय

a  MANASKRITI  website