नचारी को, मुक्तक काव्य के अन्तर्गत लोक-काव्य की श्रेणी में परिगणित किया जा सकता है। इसकी रचना में लोक-भाषा का प्रयोग और शैली में विनोद एवं व्यंजना पूर्ण उक्तियाँ रस को विलक्षण स्वरूप प्रदान कर मन का रंजन करती हैं। इनका लिखित स्वरूप सर्व प्रथम 'विद्यपति की पदावली' की पदावली में प्राप्त होता है। आराध्य के प्रति विनोद और व्यंग्य से पूर्ण, इन पदों में मुझे विलक्षण रस की अनुभूति हुई। इन 'नचारियों' के मूल में वही प्रेरणा रही है। |
नचारी
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प्रतिभा सक्सेना
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'मौन के शब्द' ऋतु शर्मा नन्नन पाँडे
छोटे-छोटे जूते लाइन में रखे थे,
मासूम आँखों में डर चिपका था, नाम, धर्म, उम्र — सब मिटा दिए गए, सिर्फ़ एक चिन्ह — स्टार ऑफ़ डेविड बाकी था। बिना शोर के ट्रेनें चली थीं, सपनों को डिब्बों में बंद कर, हर स्टेशन पर कोई माँ रोई थी, और बच्चों ने ईंटों की दीवा .. पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'ठहराव' राहुल सिंह 'राहु'
आओ हम न सोचें कुछ,
न खोजें कुछ, बस यूँ ही देखें सब कुछ, इत्मीनान से... जियें इस पल के गुमान से, जो रोक रहा हमें, कौन सा यह भ्रम है? .. पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।
देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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