अप्रतिम कविताएँ
नचारी

नचारी को, मुक्तक काव्य के अन्तर्गत लोक-काव्य की श्रेणी में परिगणित किया जा सकता है। इसकी रचना में लोक-भाषा का प्रयोग और शैली में विनोद एवं व्यंजना पूर्ण उक्तियाँ रस को विलक्षण स्वरूप प्रदान कर मन का रंजन करती हैं। इनका लिखित स्वरूप सर्व प्रथम 'विद्यपति की पदावली' की पदावली में प्राप्त होता है। आराध्य के प्रति विनोद और व्यंग्य से पूर्ण, इन पदों में मुझे विलक्षण रस की अनुभूति हुई। इन 'नचारियों' के मूल में वही प्रेरणा रही है।

नचारी
(नोक -झोंक)


'पति खा के धतूरा, पी के भंगा, भीख माँगो रहो अधनंगा,
ऊपर से मचाये हुडदंगा, चढी है सिर गंगा' !
      फुलाये मुँह पारवती !
'मेरे ससुरे से सँभली न गंगा, मनमानी है विकट तरंगा,
मेरी साली है, तेरी ही बहिना, देख कहनी - अकहनी मत कहना !
      समुन्दर को दे आऊँगा !'
'रहे भूत पिशाचन संगा, तन चढा भसम का रंगा,
और ऊपर लपेटे भुजंगा, फिरे है ज्यों मलंगा' !
      सोच में है पारवती !
'तू माँस सुरा से राजी, मेरे भोजन पे कोप करे देवी |
मैंने भसम किया था अनंगा, पर धार लिया तुझे अंगा !
      शंका न कर पारवती !'
'जग पलता पा मेरी भिक्षा, मैं तो योगी हूँ, कोई ना इच्छा,
ये भूत और परेत कहाँ जायें, सारी धरती को इनसे बचाये,
      भसम गति देही की !
बस तू ही है मेरी भवानी, तू ही तन में औ' मन में समानी,
फिर काहे को भुलानी भरम में, सारी सृष्टि है तेरी शरण में !
      कुढे काहे को पारवती '!
'मैं जनम-जनम शिव तेरी, और कोई भी साध नहीं मेरी !
जो है जगती का तारनहारा पार कैसे मैं पाऊँ तुम्हारा !'
      मगन हुई पारवती !

- प्रतिभा सक्सेना

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