अप्रतिम कविताएँ
मैं दृष्टा हूँ
देखता हूँ गगन, सुमन और समुंदर की तरुणाई को,
प्रति पल धीमी होती हुई इस समय की अरुणाई को।
दु:ख के रक्त कणोंसे लतपथ जीवन के अवसाद को,
या सुख के प्यालों से छके हुए मन के अंतर्नाद को।

शीत उष्ण और वर्षा पतझड़ ऋतुएं आती जाती हैं,
इस शरीर और मन के द्वारों पर दस्तक दे जाती हैं।
मिलना और बिछोह हृदय के तारो को सहलाता है,
इस जीवन का मायाजाल शरीर को बांधे जाता है।

पर मैं लिप्त नहीं, मैं भुक्त नहीं,
अतृप्त नहीं, आसक्त नहीं।
ये समग्र विलास है जग मेरा,
पर मैं करण नहीं मैं संज्ञा नहीं।

मैं तो केवल दृष्टा हूँ,
बिन आँखों के, बिन साँसों के।
देख रहा हूँ हो विस्मित,
जिस सृष्टि का मैं सृष्टा हूँ।
- रवि सिंघल
Ravi Singhal
Email: [email protected]
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होलोकॉस्ट में एक कविता
~ प्रियदर्शन

लेकिन इस कंकाल सी लड़की के भीतर एक कविता बची हुई थी-- मनुष्य के विवेक पर आस्था रखने वाली एक कविता। वह देख रही थी कि अमेरिकी सैनिक वहाँ पहुँच रहे हैं। इनमें सबसे आगे कर्ट क्लाइन था। उसने उससे पूछा कि वह जर्मन या अंग्रेजी कुछ बोल सकती है? गर्डा बताती है कि वह 'ज्यू' है। कर्ट क्लाइन बताता है कि वह भी 'ज्यू' है। लेकिन उसे सबसे ज़्यादा यह बात हैरानी में डालती है कि इसके बाद गर्डा जर्मन कवि गेटे (Goethe) की कविता 'डिवाइन' की एक पंक्ति बोलती है...

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राष्ट्र वसन्त
रामदयाल पाण्डेय

पिकी पुकारती रही, पुकारते धरा-गगन;
मगर कहीं रुके नहीं वसन्त के चपल चरण।

असंख्य काँपते नयन लिये विपिन हुआ विकल;
असंख्य बाहु हैं विकल, कि प्राण हैं रहे मचल;
असंख्य कंठ खोलकर 'कुहू कुहू' पुकारती;
वियोगिनी वसन्त की...

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