लॉकडाउन और मैं
गज़ब वो दिन थे, मैदानों पर होते थे जब सारे खेल;
अब तो घर में बैठे हैं बस, सर में खूब लगाकर तेल।
पुस्तकें सारी पढ़ डाली हैं, रंग डाले हैं सारे चित्र,
धमाचौकड़ी करें भी कैसे, अब जो घर न आते मित्र।

कंप्यूटर पर क्लास है लगती, उछल-कूद भी घर के अन्दर,
घर में ऐसा बंद हुआ मैं मानो चिड़ियाघर में बन्दर!
पक्षी सारे चीं-चीं करके फुर्र-फुर्र कर उड़ जाते हैं,
देखो कैसे घूम रहे हम, कहकर मुँह चिढ़ाते हैं।

थोड़ा गुस्सा आता पर मैं घर में हाथ बँटाता हूँ।
यह सब सीखा घर बैठे-- अब खुद से ही नहाता हूँ,
कस के बाँधूँ मास्क शक्ल पर, घिस-घिस धोऊँ हाथ,
ख़त्म कोरोना को करके मैं होऊँगा आज़ाद!
- टुषी भट्टाचार्य

काव्यालय को प्राप्त: 4 May 2021. काव्यालय पर प्रकाशित: 2 Jul 2021

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इस महीने :
'एक कवि का अंतर्द्वंद्व'
विनय सौरभ


वह बहुत उदास-सी शाम थी
जब मैं उस स्त्री से मिला

मैंने कहा - मैं तुमसे प्रेम करता हूँ
फिर सोचा - यह कहना कितना नाकाफ़ी है
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'वो हवा वहीं ठहरी है'
प्रकाश देवकुलिश


वो हवा वहीं ठहरी है अभी तक
और छूती है रोज
लगभग रोक लेती हुई सी
जब गुजरने लगता हूँ वहाँ से
जहाँ उस दिन गुजरते फोन आ गया था तुम्हारा
और थोड़ी देर के लिए आस पास
चम्पा के फूल खिल आये थे
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'तेरी हँसी कृष्ण विवर सी'
पूनम सिन्हा


छोटी सी दुनिया
कितने सारे लोग
रज तम सत का
विभिन्न संयोग।
सहूलियत के हिसाब से
बाँट लिया,
कितने नामों से
पुकार लिया,
मान्यताओं और परम्पराओं में
जकड़ लिया
... ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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