किताब
हैरत है।
अक्षर नहीं हैं आज किताब पर

कहाँ चले गए अक्षर
एक साथ अचानक?

सबेरे सबेरे
काले बादल उठ रहे हैं चारों ओर से
मैली बोरियां ओढ़कर सड़क की पेटियों पर
गंदगी के पास सो रहे हैं बच्चे
हस्पताल के बाहर सड़क में
भयानक रोग से मर रही है एक युवती
पैबन्द लगे मैले कपड़ों में
हिमाल में ठंड से बचने की प्रयास में कुली
एक और प्रहर के भोजन के बदले
खुदको बेच रहे हैं लोग ।

मैं एक एक करके सोच रहा हूँ सब दृश्य
चेतना को जमकर कोड़े मारते हुए,
खट्टा होते हुए, पकते हुए
खो रहा हूँ खुद को अनुभूति के जंगल में ।

कितना पढूँ ? बारबार सिर्फ किताब
समय को टुकडों में फाड़कर
मैं आज दुःख और लोगों के जीवन को पढूंगा ।

अक्षर नहीं हैं किताब पर आज।
- भीष्म उप्रती
- अनुवाद: कुमुद अधिकारी
***
इस महीने
'होली की शाम'
गीता मल्होत्रा


होली की शाम सड़कें वीरान
जैसे गुज़र गया हो कारवाँ
छोड़ गया कुछ अपनी निशानियाँ -- ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने
'मामला संगीन है'
नीशू पूनिया


घाटी है... एक औरत

उसी सदियों पुरानी देग में...
ख़ुद के गोश्त को पकाती

कतरा दर कतरा
ख़ुद को ख़ुदी से... करती हलाल
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने
'श्रीहत फूल पड़े हैं'
वीरेन्द्र शर्मा


अंगारों के घने ढेर पर
यद्यपि सभी खड़े हैं
किन्तु दम्भ भ्रम स्वार्थ द्वेषवश
फिर भी हठी खड़े हैं

क्षेत्र विभाजित हैं प्रभाव के
बंटी धारणा-धारा
वादों के भीषण विवाद में
बंटा विश्व है सारा
शक्ति संतुलन रूप बदलते
घिरता है अंधियारा
किंकर्त्तव्यविमूढ़ देखता
विवश मनुज बेचारा ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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शुक्रवार 29 मार्च को

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