कैसे रो दूँ
नारी तो नीरों से धो लेती है अपने सुख दुख को,
मोती की बूँदों से सज्जित कर लेती अपने मुख को।
बाहर से वह कोमल होकर अन्दर दृढ हो जाती है,
ऐसा करने पर नारी की छवि नहीं खो जाती है।

लेकिन नर की बात अलग है, वह तो सब सह जाता है,
किन्तु कभी जो रोया तो फिर वह नारी कहलाता है।
पुरुष हूँ मैं, बलवान छवि को यूँ ही मैं कैसे खो दूँ,
पौरुष के आडम्बर को झुठला कर मैं कैसे रो दूँ।

मेरे अपनों को भी किस्मत ने बेवक्त ही छीना है,
लोगों की बातें सुनकर छलनी मेरा भी सीना है।
बार बार विफलता पाकर मैं भी आहत होता हूँ,
आशाओं पर पानी फिरता है तो मन में रोता हूँ।

दुनिया के आगे नर को दुख कहने का अधिकार नहीं,
पत्थर-दिल तो स्वीकृत है, पर भावुक नर स्वीकार नहीं।
आँसू का आभुषण जग को नारी पर ही भाया है,
मेरी भावुकता को आडम्बर कहकर ठुकराया है।

ऐसे हालातों में पौरुष का यह स्वांग ही बचता है,
सच कोई न माने तो यह झूठ नए नित रचता है।
तुम ही मुझे बताओ भला पुरुषार्थ यह मैं कैसे खो दूँ,
पौरुष के आडम्बर को झुठला कर मैं कैसे रो दूँ।
- वैभव नेहरा
Email: [email protected]

काव्यालय को प्राप्त: 15 Oct 2017. काव्यालय पर प्रकाशित: 8 Mar 2018

***
इस महीने :
'छिपा लेना'
राम कृष्ण "कौशल"


जब वेग पवन का बढ़ जाए
अंचल में दीप छिपा लेना।

कुछ कहते कहते रुक जाना
कुछ आंखों आंखों कह देना
कुछ सुन लेना चुपके चुपके
कुछ चुपके चुपके सह लेना

रहने देकर मन की मन में
तुम गीत प्रणय के गा लेना
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'सूर्य'
रामधारी सिंह 'दिनकर'


सूर्य, तुम्हें देखते-देखते
मैं वृद्ध हो गया।

लोग कहते हैं,
मैंने तुम्हारी किरणें पी हैं,
तुम्हारी आग को
पास बैठकर तापा है।

और अफ़वाह यह भी है
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :

'काव्यालय के आँकड़े - जुलाई 2020 से मार्च 2021'


जब विश्व भर में मानवजाति एक नए अदृश्य ख़तरे से लड़ रही थी, तब काव्यालय के जीवन में क्या हो रहा था? प्रस्तुत है काव्यालय का चौथा वार्षिक रिपोर्ट -- ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
आज नदी बिल्कुल उदास थी -- केदारनाथ अग्रवाल
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
आपकी कविता | सम्पर्क करें | हमारा परिचय

a  MANASKRITI  website