अप्रतिम कविताएँ
विसंगतियां
जब भी मुझे
जंजीरों का अहसास
कुछ ज्यादा हुआ है
कुछ कर गुज़रने की ललक
मुझमें बढ़ी है
सीमाएं तोड़ जाने की शक्ति
मेरे बंधे हाथों ने दी है
पैरों की बेड़ियों ने
गगनचुम्बी हौसले दिए हैं
सच कहूँ ठोकरों ने मेरी ज़िन्दगी
गतिशील ही की है
जब भी दोस्तों ने मेरे
अस्तित्व को नकारना चाहा
मुझे अपनी ही पहचान मिली है ।
- कान्ता गोगिया
Kanta Gogia
Email: [email protected]
Kanta Gogia
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विषय:
संकल्प (14)

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
इस महीने :
'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी


रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार

स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'लेखक'
आशीष क़ुरैशी ‘माहिद’


ख़ाली पन्ना किसी खेत-सा
पड़ा रहता है उजाड़।
क़लम की नोक ही बनती है
कुदाल, हँसिया और हल।

हल, जो यादों को कुरेदते हुए
अतीत को खरोंचते हुए

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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