अप्रतिम कविताएँ
समय बना है यादों से
आज हुआ मन को विश्वास
समय बना है यादों से
यादें बनती भूल भूल कर
तुम क्या इस को स्वीकारोगे?
व्यथित हुआ करता है जब मन
कुंठित होती है जब पीड़ा
तब क्या याद न कुछ आता है?
वह क्षण जो केवल अपना था
आज बन गया जो इतिहास।

आज हुआ मन कोआभास
स्मृति विस्मृति साथ चली हैं
मैं इनके छोटे से कण ले
कभी कहीं गुम हो जाऊंगी
मृदुल मधुर दे करअहसास
निस्पृह सा दे कर अहसास।
- सुमन शुक्ला
विषय:
जीवन (37)
बीता समय (18)
समय (7)

काव्यालय को प्राप्त: 25 Mar 2020. काव्यालय पर प्रकाशित: 29 May 2020

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
इस महीने :
'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी


रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार

स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'लेखक'
आशीष क़ुरैशी ‘माहिद’


ख़ाली पन्ना किसी खेत-सा
पड़ा रहता है उजाड़।
क़लम की नोक ही बनती है
कुदाल, हँसिया और हल।

हल, जो यादों को कुरेदते हुए
अतीत को खरोंचते हुए

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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