अप्रतिम कविताएँ
प्रतीक्षा के पल
जहाँ भी देखूँ तुम्हीं हो हर ओर
प्रतीक्षा के पल, फिर कहाँ किस ओर ॥

चेहरे पर अरुणाई सी खिल जाती
धड़कनें स्पन्दन बन मचल जाती
यादों की बारिश में, नाचे मन मोर ॥

कब तन्हा जब साथ तुम, बन परछाई
साथ देख तुम्हारा खुदा भी मांगे मेरी तन्हाई
मेरे हर क्षण को सजाया, तुमने चित्त चोर ॥

मेरे संग चांद भी करता रहता इंतज़ार
तेरी हर बात को उससे कहा मैंने कितनी बार
फिर भी सुनता मुस्कुराकर, जब तक न होती भोर ॥

तुम्हारे लिए हूँ मैं शायद, बहुत दूर
तुम पर पास मेरे, जितना आँखों के नूर
मेरी साँसों को बाँधे, तेरे स्नेह की डोर ॥
- माहिमा बोकाडिया
Mahima Bokariya
Email: [email protected]
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विषय:
प्रेम (63)

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
इस महीने :
'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी


रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार

स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'लेखक'
आशीष क़ुरैशी ‘माहिद’


ख़ाली पन्ना किसी खेत-सा
पड़ा रहता है उजाड़।
क़लम की नोक ही बनती है
कुदाल, हँसिया और हल।

हल, जो यादों को कुरेदते हुए
अतीत को खरोंचते हुए

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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