अप्रतिम कविताएँ
परमाणू ऊर्जा
अति सूक्ष्म परमाणु
असीमित उर्जा भंडार
साध इनकी शक्ति
सृजनात्मकता अपार!

कलुषित मन विचार
दे रूप इसे विकराल,
यह वो ब्रह्मास्त्र है -
जिससे धरा बने पाताल!

परमाणुओं का यह महादैत्य
कल्पित नहीं यथार्थ है,
यदि बोतल से निकला
सृष्टि का विनाश है!

हिरोशिमा तो अल्पांश था
परमाणु शक्ति विध्वंस का,
परमाणु अस्त्रागार है -
सौ सौ धरा के नाश का!

संभल मानव
अभी समय है,
विध्वंस तांडव से पूर्व
निद्रा अपनी पूर्ण कर ले!

इस अग्नि बीज लो
एकत्र करना बंद कर,
पूर्व इसमें भस्म हो
धरा मानव इतिहास बन ले!
- कवि कुलवंत सिंह
Kavi Kulwant Singh
Email : [email protected]
Kavi Kulwant Singh
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विषय:
गणित विज्ञान (9)

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इस महीने :
'आठ वर्ष'
जया प्रसाद


रिमझिम सावन बरसा जब
अंक तुम्हें भर लायी थी
कुछ खोयी-सी, कुछ अबूझ
कुछ खुश, कुछ घबराई थी

गोल-मटोल, चार पैर पर
घर-आँगन सब नाप लिया
नन्हे वामन जैसे तुमने
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
इस महीने :
'यूंँ पति की मांँ बनते जाना'
किरण सिपानी


हर पल वीडियो दिखाकर फुसलाते जाना
और यूंँ कौरों का हलक से उतरते जाना ‌
कभी वायलिन पकड़ना, कभी झटक के रख देना
रूठना- मचलना- न नहाने की ज़िद करते रहना
कातर नजरों से मेरे हुक्म को सिर्फ तकते रहना
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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