अप्रतिम कविताएँ
निछावर तुम पर
मैं दीपशिखा सी जलूं तुम्हारे पथ पर।
मेरा सारा संसार निछावर तुम पर।

मेरी आशा, अभिलाषाओं के उद्गम।
मेरे सुहाग, मेरे सिंगार के संगम।

मेरे अतीत, मेरे भविष्य के दर्पण।
मेरा सतीत्व, नारीत्व तुम्ही को अर्पण।

अपना व्याकुल कौमार्य्य संभाले लाई।
अतिशय पीड़ा का भार उठाये आई।

स्वीकार करो ये युगों युगों से संचित।
मेरी पूजा के पुष्प तुम्ही को अर्चित।

मेरे अपेक्ष्य, आराध्य देव सर्वोपर,
तुम सूर्य सरीखे सजो निरन्तर नभ पर।

मैं दीपशिखा सी जलूं तुम्हारे पथ पर।
मधु का सारा माधुर्य्य निछावर तुम पर।
- मधु
दीपशिखा : दीपक की लौ; उद्गम : उत्पत्ति का स्थान; सूर्य सरीखे : सूर्य के समान
विषय:
प्रेम (63)

काव्यालय पर प्रकाशित: 3 Apr 2020

***
सहयोग दें
विज्ञापनों के विकर्षण से मुक्त, काव्य के सुकून का शान्तिदायक घर... काव्यालय ऐसा बना रहे, इसके लिए सहयोग दे।

₹ 500
₹ 250
अन्य राशि
इस महीने :
'ठहराव'
राहुल सिंह 'राहु'


आओ हम न सोचें कुछ,
न खोजें कुछ,
बस यूँ ही देखें सब कुछ,
इत्मीनान से...
जियें इस पल के गुमान से,
जो रोक रहा हमें,
कौन सा यह भ्रम है?
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'देश की नागरिक'
वाणी मुरारका


आज जब चुनाव नहीं हैं,
आज फिर से चुनती हूँ --
इस देश को मैं अपने मन में
क्या गढ़ूँगी?
कौन से देश की नागरिक बनूँगी?
सवाल खुद से करती हूँ|
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'तू ज़िंदा है'
शैलेंद्र


तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत पे यक़ीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर।

ये सुबह-ओ-शाम के रँगे हुए गगन को चूमकर
तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूम कर!

तू आ मेरा सिंगार कर तू आ मुझे हसीन कर।
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
सम्पर्क करें | हमारा परिचय
सहयोग दें

a  MANASKRITI  website