अप्रतिम कविताएँ
निछावर तुम पर
मैं दीपशिखा सी जलूं तुम्हारे पथ पर।
मेरा सारा संसार निछावर तुम पर।

मेरी आशा, अभिलाषाओं के उद्गम।
मेरे सुहाग, मेरे सिंगार के संगम।

मेरे अतीत, मेरे भविष्य के दर्पण।
मेरा सतीत्व, नारीत्व तुम्ही को अर्पण।

अपना व्याकुल कौमार्य्य संभाले लाई।
अतिशय पीड़ा का भार उठाये आई।

स्वीकार करो ये युगों युगों से संचित।
मेरी पूजा के पुष्प तुम्ही को अर्चित।

मेरे अपेक्ष्य, आराध्य देव सर्वोपर,
तुम सूर्य सरीखे सजो निरन्तर नभ पर।

मैं दीपशिखा सी जलूं तुम्हारे पथ पर।
मधु का सारा माधुर्य्य निछावर तुम पर।
- मधु
दीपशिखा : दीपक की लौ; उद्गम : उत्पत्ति का स्थान; सूर्य सरीखे : सूर्य के समान
विषय:
प्रेम (63)

काव्यालय पर प्रकाशित: 3 Apr 2020

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इस महीने :
'आठ वर्ष'
जया प्रसाद


रिमझिम सावन बरसा जब
अंक तुम्हें भर लायी थी
कुछ खोयी-सी, कुछ अबूझ
कुछ खुश, कुछ घबराई थी

गोल-मटोल, चार पैर पर
घर-आँगन सब नाप लिया
नन्हे वामन जैसे तुमने
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
इस महीने :
'यूंँ पति की मांँ बनते जाना'
किरण सिपानी


हर पल वीडियो दिखाकर फुसलाते जाना
और यूंँ कौरों का हलक से उतरते जाना ‌
कभी वायलिन पकड़ना, कभी झटक के रख देना
रूठना- मचलना- न नहाने की ज़िद करते रहना
कातर नजरों से मेरे हुक्म को सिर्फ तकते रहना
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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