अप्रतिम कविताएँ
गीत बनाने की जिद है
दीवारों से भी बतियाने की जिद है
हर अनुभव को गीत बनाने की जिद है

         दिये बहुत से गलियारों में जलते हैं
         मगर अनिश्चय के आँगन तो खलते हैं

कितना कुछ घट जाता मन के भीतर ही
अब सारा कुछ बाहर लाने की ज़िद है

         जाने क्यों जो जी में आया नहीं किया
         चुप्पा आसमान को हमने समझ लिया

देख चुके हम भाषा का वैभव सारा
बच्चों जैसा अब तुतलाने की ज़िद है

         कौन बहलता है अब परी कथाओं से
         सौ विचार आते हैं नयी दिशाओं से

खोया रहता एक परिन्दा सपनों का
उसको अपने पास बुलाने की ज़िद है

         सरोकार क्या उनसे जो खुद से ऊबे
         हमको तो अच्छे लगते हैं मंसूबे

लहरें अपना नाम-पता तक सब खो दें
ऐसा इक तूफान उठाने की ज़िद है
- यश मालवीय
Poet's Address: E-111 Mehandouri Colony, Allahabad-4
Ref: Naye Purane, 1999
विषय:
संकल्प (14)

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पश्चिम में ढलका सूर्य उठा वंशज सरयू की रेती से,
हारा-हारा, रीता-रीता, निःशब्द धरा, निःशब्द व्योम,
निःशब्द अधर पर रोम-रोम था टेर रहा सीता-सीता।

किसलिए रहे अब ये शरीर, ये अनाथमन किसलिए रहे,
धरती को मैं किसलिए सहूँ, धरती मुझको किसलिए सहे।
तू कहाँ खो गई वैदेही, वैदेही तू खो गई कहाँ,
..

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बड़े निराले होते हैं,
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