अप्रतिम कविताएँ
चाँद के साथ-साथ

पेड़ों के झुरमुट से
झाँकता
चाँद पूनम का
बिल्डिंगों की ओट में
चलता है साथ-साथ
भर रास्ते

पहुँचा के घर
सुस्ताता है
टँग जाता है
बाहर खिड़की के
आसमान में

हौले से
खिसक लेता है
बत्तियों के
गुल होने
और
नींद के पसर जाने के बाद

जैसे
किसी बच्चे को
थपकी दे-दे
सुला देना
और
बना कर तकियों की बाड़
हौले से
उठ जाना
करने को
छूटे काम
- चेतन कश्यप
काव्यपाठ: नूपुर अशोक
विषय:
चाँद (8)

काव्यालय को प्राप्त: 20 May 2025. काव्यालय पर प्रकाशित: 5 Dec 2025

***
सहयोग दें
विज्ञापनों के विकर्षण से मुक्त, काव्य के सुकून का शान्तिदायक घर... काव्यालय ऐसा बना रहे, इसके लिए सहयोग दे।

₹ 500
₹ 250
अन्य राशि
इस महीने :
'न्यूज़ चैनल'
प्रियदर्शन


यहाँ त्रासदियाँ
प्रहसन में बदली जाती हैं,
भाषा तमाशे में
और लोग कठपुतलियों में।
तबाहियों की खुराक
इसका पेट भरती है।
बहुत मनोयोग से
किया जाता है
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'राम की जल समाधि'
भारत भूषण


पश्चिम में ढलका सूर्य उठा वंशज सरयू की रेती से,
हारा-हारा, रीता-रीता, निःशब्द धरा, निःशब्द व्योम,
निःशब्द अधर पर रोम-रोम था टेर रहा सीता-सीता।

किसलिए रहे अब ये शरीर, ये अनाथमन किसलिए रहे,
धरती को मैं किसलिए सहूँ, धरती मुझको किसलिए सहे।
तू कहाँ खो गई वैदेही, वैदेही तू खो गई कहाँ,
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'रंग और मैं'
आशा जैसवाल


बड़े निराले होते हैं,
जीवन के ये रंग।
कभी उषा की लालिमा
बन कर मन में
आशाओं के कमल
खिला जाते हैं
तो कभी
निराशा की ... ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
सम्पर्क करें | हमारा परिचय
सहयोग दें

a  MANASKRITI  website