अप्रतिम कविताएँ
गौरा का सुहाग
नैन भरे माई दिहिले, सुहाग भर भर हंडा,
एतन सुहाग गौरा पाइन धूम भइल तिहुँ खण्डा !
मारग में सारी मेहरियाँ दौरि आवन लगलीं,
गौरा के चरनन लगलीं सुहाग पावन लगलीं !

खेतन ते भागी पनघट से भगि आई, घाटन से भागी धुबिनियाँ
गोरस बहिल, ऐसी लुढकी मटकिया तौ हूँ न रुकली बवरिया
दौरी भडभूजी, मालिन, कुम्हारिन बढनी को फेंक कामवारी
गौरा लुटाइन सुहाग दोउ हाथन, लूटेन जगत के नारी,
ऊँची अटारिन खबर भइली, सुनि पहने ओढे लागीं घरनियाँ
करिके सिंगार घर आंगन अगोरे तक बचली फकत एक हँडिया
चुटकी भरिल गौरा उनहिन को दिहला, एतना रे भाग तुम्हारा,
दौरि दौरि लूटि लूटि लै गईं लुगइयां, जिनके सिंगार न पटारा !
एही चुटकिया जनम भर सहेजो, मँहगा सुहाग का सिंदुरवा
तन मन में पूरो, अइसल सँवारो रंग जाये सारी उमरिया !
गौरा का सेंदुर अजर अमर भइला, उन जैसी कौ बडभागिन रे,
इनही से पाये सुहाग सुख, दूध, पूत, तीनिउँ जगत की वासिन रे,
भुरजी, कुम्हरिन से जाँचित चुटकि भर, कन्या सुहाग भाग मांगे
गौरा की किरपा भइल कमहारिन पे जिनका सुहाग नित जागे !
- प्रतिभा सक्सेना
विषय:
शिव पार्वती (4)

***
सहयोग दें
विज्ञापनों के विकर्षण से मुक्त, काव्य के सुकून का शान्तिदायक घर... काव्यालय ऐसा बना रहे, इसके लिए सहयोग दे।

₹ 500
₹ 250
अन्य राशि
प्रतिभा सक्सेना
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

इस महीने :
'यूंँ पति की मांँ बनते जाना'
किरण सिपानी


हर पल वीडियो दिखाकर फुसलाते जाना
और यूंँ कौरों का हलक से उतरते जाना ‌
कभी वायलिन पकड़ना, कभी झटक के रख देना
रूठना- मचलना- न नहाने की ज़िद करते रहना
कातर नजरों से मेरे हुक्म को सिर्फ तकते रहना
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'यह करूँगा मैं'
सुहैर हम्माद


नहीं नाचूँगा मैं
तुम्हारे युद्ध के
नगाड़ों पर। न ही दूँगा
अपनी आत्मा, न ही अपनी अस्थियाँ
तुम्हारे युद्ध के नगाड़ों को। नहीं
नाचूँगा तुम्हारी
ताल पर। मैं जानता हूँ उस ताल को।
जान नहीं है उसमें। जिस चमड़े को ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'मौन के शब्द'
ऋतु शर्मा नन्नन पाँडे


छोटे-छोटे जूते लाइन में रखे थे,
मासूम आँखों में डर चिपका था,
नाम, धर्म, उम्र — सब मिटा दिए गए,
सिर्फ़ एक चिन्ह — स्टार ऑफ़ डेविड बाकी था।

बिना शोर के ट्रेनें चली थीं,
सपनों को डिब्बों में बंद कर,
हर स्टेशन पर कोई माँ रोई थी,
और बच्चों ने

ईंटों की दीवा ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
सम्पर्क करें | हमारा परिचय
सहयोग दें

a  MANASKRITI  website